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अष्टापद तीरथ की महिमा, जग में अपरम्पारा रे....
रचयिता कनकराज पालरेचा 'मयूर', रानी
मदर इन्डिया)
( तर्ज : नगरी - नगरी द्वारे-द्वारे अष्टापद तीरथ की महिमा, जग में अपरम्पारा रे आदीश्वर निर्वाण हुए, जहाँ प्रष्टापद कहलाया रे
अष्टापद
तीन कोस ऊँचे पर्वत पर एक योजन विस्तार में.... एक प्रथम चौबीसी की प्रतिभा भराई
मणिरत्नों के मन्दिर में... मरिण चैत्य वृक्ष, कल्पवृक्ष, सरोवर, मठ, कूप, बावड़ी बनाई रे अष्टापद तीरथ ... ।। १ ।।
सगर चक्री के पुत्र साठ हजार, तीर्थरक्षा में लीन बने .. तीर्थ भक्ति कर रावण राजा ने गोत्र तीर्थंकर बँधाया रे. गोत्र गुरु गौतम ने पन्द्रह सौ तीन तापस को
शुद्ध मन से प्रतिबोध दिया अष्टापद तीरथ ... ।। २ ।।
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