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________________ (११५) [ षष्ठ परिच्छेद अर्थ - 'पाँच भूतों से भिन्न आत्मा नहीं है' यह प्रत्यक्षनिराकृतसाध्यधर्मविशेषण पक्षाभास है । विवेचन - पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश - इन पाँच भूतों से भिन्न आमा का स्वसंवेदन प्रत्यक्ष से अनुभव होता है, अतः 'भूतों से भिन्न आत्मा नहीं है' यह पक्ष प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है । अनुमाननिराकृत अनुमाननिराकृतसाध्यधर्मविशेषणो यथा - नास्ति सर्वज्ञो वीतरागो वा ॥ ४२ ॥ अर्थ- 'सर्वज्ञ अथवा वीतराग नहीं है' यह अनुमाननिराकृतसाध्यधर्मविशेषण पक्षाभास है । विवेचन – अनुमान प्रमाण से सर्वज्ञ और वीतराग की सत्ता सिद्ध है, अत: 'सर्वज्ञ या वीतराग नहीं है' यह प्रतिज्ञा अनुमान से बाधित है। श्रागमनिराकृत श्रागमनिराकृतसाध्यधर्मविशेषणो यथा - जैनैः रजनिभोजनं भजनीयम् ॥ ४३ ॥ अर्थ - 'जैनों को रात्रि - भोजन करना चाहिये' यह आगम निराकृत-साध्यधमविशेषण पक्षाभास है । विवेचन – जैन आगमों में रात्रिभोजन का निषेध किया गया है। कहा है
SR No.022434
Book TitlePramannay Tattvalok
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShobhachandra Bharilla
PublisherAatmjagruti Karyalay
Publication Year1942
Total Pages178
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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