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________________ २०६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पक्षातिक्रांतस्य किंवरूपमिति चेत्; दोण्हवि णयाण भणियं जाणइ णवरं तु समयपडिवद्धो। ण दु णयपक्खं गिण्हदि किंचिवि णयपक्खपरिहीणो ॥१४३॥ द्वयोरपि नययोर्भणितं जानाति केवलं तु समयप्रतिबद्धः । न तु नयपक्षं गृह्णाति किंचिदपि नयपक्षपरिहीनः ॥ १४३ ॥ यथा खलु भगवान्केवली श्रुतज्ञानावयवभूतयोर्व्यवहारनिश्चयनयपक्षयोः विश्वसाक्षितया केवलं स्वरूपमेव जानाति न तु सततमुल्लसितसहजविमलसकलकेवलज्ञानतया नित्यं स्वयमेव विज्ञानघनभूतत्वाच्छ्रुतज्ञानभूमिकातिक्रांततया समस्तनयपक्षपरिग्रहदूरीभूतत्वात्कंचनापि नयपक्षं परिगृह्णाति। तथा किल यः श्रुतज्ञानावयवभूतयोर्व्यवहारनिश्चयनयपक्षयोः क्षयोपशमविजूंभितश्रुतज्ञानात्मकविकल्पप्रत्युद्गमनेपि परपरिग्रहप्रतिनिवृत्तौत्सुक्यतया स्वअथ नयपक्षातिक्रांतस्य शुद्धजीवस्य किंस्वरूपमिति पृष्टे सति पुनर्विशेषेण कथयति;योसौ नयपक्षपातरहितः स्वसंवेदनज्ञानी तस्याभिप्रायेण बद्धाबद्धमूढामूढादिनयविकल्परहितं चिदानंदैकस्वभावं । दोण्हवि णयाण भणियं जाणइ यथा भगवान् केवली निश्चयव्यवहाराभ्यां द्वाभ्यां भणितमर्थं द्रव्यपर्यायरूपं जानाति । णवरंतु समयपरिबद्धो तथापि नवरि केवलं सहजपरमानंदैकखभावस्य समयस्य प्रतिबद्ध आधीनः सन् णयपक्खपरिहीणो सततसमुल्लसन् केवलज्ञानरूपतया श्रुताज्ञानावरणीयक्षयोपशमजनितविकल्पजालरूपान्नयद्वयपक्षपाताददूरीभूतत्वात् ण दुणयपक्खं गिण्हदि किंचिवि न तु नयपक्षं विकल्पं किमप्या आगे पूछते हैं कि जो पक्षसे दूरवर्ती है उसका क्या स्वरूप है ? उसका उत्तररूप गाथा कहते हैं, जो पुरुष [ समयप्रतिबद्धः ] अपने शुद्धात्मासे प्रतिबद्ध है आस्माको जानता है वह [द्वयोरपि] दोनों ही [ नययोः ] नयोंके [भणितं ] कथनको [ केवलं] केवल [जानाति तु] जानता ही है [ तु] परंतु [नयपक्षं] नयपक्षको [किंचिदपि कुछ भी [ न गृह्णाति ] नहीं ग्रहण करता क्योंकि वह [ नयपक्षपरिहीनः] नयके पक्षसे रहित है ॥ टीका-यहां पर पहले दृष्टांत कहते हैं—जैसे केवली भगवान सर्वज्ञ वीतराग समस्त वस्तुओंके साक्षीभूत हैं ज्ञाता द्रष्टा हैं । सो श्रुतज्ञानके अवयवभूत जो व्यवहार निश्चयनयके पक्षरूप दो नय उनके केवल स्वरूपको जानते ही हैं परंतु किसी भी नयके पक्षको नहीं ग्रहण करते । क्योंकि केवली भगवान निरंतर उदयरूप स्वाभाविक निर्मल केवलज्ञानस्वभाव हैं इसलिये नित्य ही स्वयमेव विज्ञानघन स्वरूप हैं । इसीलिये श्रुतज्ञानकी भूमिकासे अतिक्रांतपनेकर समस्त नयपक्षोंके परिग्रहसे दूरवर्ती हैं। उसी तरह जो मति श्रुतज्ञानी है वह भी श्रुत ज्ञानके अवयवभूत व्यवहार निश्चयरूप दोनों नयोंके पक्षके स्वरूपको केवल जानता है क्योंकि इसके क्षायोपशमिकज्ञान है उससे उत्पन्न जो श्रुतज्ञानस्वरूपविकल्प उनका फिर
SR No.022398
Book Titlesamaysar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherJain Granth Uddhar Karyalay
Publication Year1919
Total Pages590
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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