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________________ ॥ किमाहारद्वारवर्णनम् ॥ (४५) ॥ किमाहारद्वारम.॥ किम् एटले कइ दिशिनो (दिशिथी आवेलो) आहार एटले आहार होय ? ते संबंधि जे निर्णय कहेवो ते किमाहार कहेवाय. त्यां लोकने अन्ते (किनारे) रहेला सूक्ष्म अपर्याप्त पृथ्व्यादि ५ तथा सूक्ष्मपर्याप्त पृथ्व्यादि ५ तथा बादरपर्याप्तवायु अने बादरअपर्याप्तवायु ए १२ जीवभेदने ३-४-५दिशिनो आहार होय, अने ए १२ सहित सर्व जीवभेदो जे लोकनी अंदरना भागमां-(लोकनो दशे दिशाए फरतो अन्त्य किनारो छोडीने अंदरना सर्व भागमां) रहेला छे तेओने सर्वने छ ए दिशिथी आवेलो आहार होय छे. शंका:-जीव जे आकाश प्रदेशोमां अवगाह्यो छे तेज आकाश प्रदेशमा रहेला आहारने ग्रहण करे छे तो छए दिशाथी आवेलो आहार ग्रहण करे ते केवी रीते ? उत्तरः-ए वात सत्य छे, परन्तु जीव जे आकाश प्रदेशोमां अवगाह्यो छे ते आकाश प्रदेशमा आहार ग्रहण समये ६ ए दिशिथी आवता पुद्गलोने ग्रहण करे छे, माटे ६ दिशिथी आवेला पुद्गलो ग्रहण करे एम कही शकाय. ए आहार ग्रहण व्याघातभावी अने निर्व्याघातभावी एम बे प्रकारचें छे, त्यां अलोकाकाशवडे आहार पुद्गलोने आवतां.जे स्खलना थाय अर्थात् न आवी शके ते व्याघात कहेवाय अने ते व्याघातना कारणथी जीव सर्व दिशिथी आहार न ग्रहण करो शके पण ओछी दिशिथी आहार ग्रहण करे ते घ्याघातभावीआहार कहेवाय, प्रथम जे ३-४-ने ५ दिशिथी जे आहार ग्रहण कर्यु ते व्याघातभावी आहार ग्रहण जाणवू. अने तेवा व्याघातना अभावे सर्वदिशिथी एटले. छए दिशिथी जे आहारनुं ग्रहण थाय ते निर्व्याघातभावीआहार कहेवाय.
SR No.022358
Book TitleDandak Prakaranam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajasarmuni, Vijayodaysuri
PublisherGranth Prakashak Sabha
Publication Year1925
Total Pages222
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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