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॥ दंडकविस्तरार्थः ॥
इन्द्रियो द्रव्येन्द्रिय अने भावेन्द्रियरूप बे प्रकारे छे, तेमां पण स्पर्शन सिवायनी रसनादि ४ द्रव्य इन्द्रियो अभ्यन्तरनिति अने बाह्यनिति-( अंतरंग आकार ने बहार देखातो आकार ) एम बे प्रकारनी छे, त्यां जीव्हा-नाक इत्यादि जे दृष्टिगोचर थाय छे ते बाह्यनिति छे, अने ए बाह्य आकारोनी अंदर विषय ग्रहण करवानी शक्तिवाळां, अने दृष्टिथी नहिं देखी शकाय एवां सूक्ष्म परिणामी पुद्गलो कदंबपुष्पादि आकारे गोठवायला छे ते अभ्यन्तरनिवृति कहेवाय छे. तथा ए बन्ने द्रव्येन्द्रियोमा स्वस्वकार्य करवारूप रहेली जे शक्ति ते अभ्यन्तर तथा बाह्य उपकरणन्द्रिय कहेवाय छे, ए प्रसिद्ध सिद्धान्त छे, अने आचारांगजीमां तो इ. न्द्रियस्थाने गोठवायला स्वच्छतर आत्मप्रदेशो ते अभ्यन्तरनिईति, अने विषयग्रहण शक्तिवाळां स्वच्छतर सूक्ष्मपुद्गलो के जे कदंबपुष्पादि आकारवाला छे ते बाह्यनिति कहेल छे, अर्थात् प्रज्ञापनादिमां जेने अभ्यन्तरनिति मानी छे तेने श्रीआचारांगजी वृत्तिमां बाह्य निति मानी छे, ए प्रमाणे द्रव्येन्द्रियना भेद कह्या. हवे भावन्द्रिय आ प्रमाणे
लब्धि अने उपयोग एम भावेन्द्रिय बे प्रकारनी छे, त्यां मतिज्ञानावरणादिना क्षयोपशमथी इन्द्रियद्वारा विषय ग्रहण करवानी जे आत्मशक्ति ते लब्धि भावेन्द्रिय दरेक जीवमात्रने समकाळे पांचे इन्द्रियरूप होय छे, अने प्राप्त थयेली अभ्यन्तरनितिरूप द्रव्येन्द्रियद्वारा विषय ग्रहणमा प्रवर्तवू ते उपयोग भावेन्द्रिय ते एक भवमा कोइ जीवने एक, कोइने बे यावत् कोइने पांचे जुदे जुदे वखते होय छे.
जीव एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय इत्यादि कहेवाय छे, ते द्रव्येन्द्रिय प्राप्तिनो अपेक्षाए छे, नहिंतर लब्धिरूप भावेन्द्रियनी अपेक्षाए सर्वे