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॥ दंडकस्तवनम् ॥
(द्वारे ६)--आहारादिक चउवीशे दंडके लहारे (द्वार ७)--देवने समचउरंस, आगेरे(२)षट् नरतिरि पंचेंद्रिनेरे॥१३॥ *(द्वार ८) नारक थावर विगल समुठिम मनुष्यनेरे; एक हुँडक संठाण, होयरे (२) चार कषाय सवि दंडकेरे ॥१४॥
॥ ढाळ २ जी. पियु पियु करतां नाम जपु दिन रातीयां--ए देशी. (द्वार ९). देव नारक नर तिरिपंचेन्द्रिय पणइन्द्रि,
थावर बि ति चउरींद्रि इग वि ति चउ बदि; (द्वार १०)-नारक वायुने चार समुद्घात आगला,
देव तियेच पंचेन्द्रियने पण(५) आदिला ॥१॥ थावर चउ विगलेन्द्रियने पहेला तिन कह्या,
मनुजने सात समुद्घात पनवणाए लह्या; (द्वार ११)-नारक नर देव तिरि पंचेन्द्रि तिदृष्टि छे,
थावर पंचने एक मिथ्यात्व ते इष्ट छे ॥२॥ विगलेन्द्रियने समकित मिथ्या ए दोय छे.
एणीपेरे द्वार एकादशभु दृष्टि होय छे; (द्वारे १२) देव नारक तिरि पंचेन्द्रियने केवल विना,
चउरिदिने चक्षु भचक्षु बे दर्शना
९ आहारसंज्ञा, भयसंझा, मैथुनसंझा, परिग्रहसंज्ञा, ए चार संज्ञा छे, १० समचतुरस्र, न्यग्रोध, सादि, वामन, कुब्ज, हुंडक ए ६ संस्थान छ, + क्रोध, मान, माया, लोभ ए ४ कषाय छे, ११ स्पर्श, रसना, घ्राण, चक्षुः, श्रोत्र ए ५ इन्द्रिय छे, १२ वेदना, कषाय मरण, पैक्रिय, तैजस, आहा. रक, केवलिक ए ७ समुदघात छे. १३मिथ्यात्व सम्यक्त्व मि. श्र, ए त्रणदृष्टि छे, १९ चक्षुदर्शन छे, अचक्षुद०, अवधिद०, केवळद० ए ४ दर्शन छे,