________________
(१४०)
॥ दंडकविस्तरार्थः॥
विस्तरार्थ:-मुगम छे. पण आगळ लघु अने महाल्पबहुता जुओ
अवतरण--आ गाथामां पण वाकी रहेला दंडकोन अल्पबहुत्व कयुं छे.
मूळ गाथा ३८ मी,॥ वाउ वणस्सइ च्चिय, अहिया अहिया कमेण मे हुंति। सव्वेवि इमे भावा, जिणा मए गंतसो पत्ता ॥ ४॥
॥ संस्कृतानुवादः ॥ वायुर्वनस्पतिश्चैव अधिका अधिका क्रमेणेमे भवन्ति । सर्वेऽपि इमे भावाः, हे जिना मया ऽनन्तशः प्राप्ताः ४२॥
॥शब्दार्थः॥ वाउ--वायुकाय
| हंति छे. वणस्सइ-वनस्पतिकाय सव्वेवि--सर्वे पण चिय-निश्चय
| इमे--ए पूर्वोक्त(पर्या०मनुष्यादि) अहिया अहिय--अधिक भावा--भाव अधिक
जिणा हे जिनेश्वरी कमेण--अनुक्रमे
मए-में इमे--ए पूर्वोक्त ( पर्याप्त अणंतसो- अनंतवार
मनुष्यादि ) | पत्ता--प्राप्त कर्या गाथार्थ:----वायुकाय अने वनस्पतिकाय निश्चय ए पूर्वोक्त (पर्या० मनुष्यादि ) अनुक्रमे अधिक अधिक छे. हे जिनेश्वरो ए सर्व । पर्या०मनुष्यत्वादि ) भावो में अनंतवार प्राप्त कर्या के. ( माटे हवे एकवार प्राप्त थनारु मोक्ष पद आपो ..-ए दंडक रूप स्तुतिनुं तात्पर्य आगळनी गाथा साथे संबन्धवाळु छे. )