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॥ दंडकेषु अल्पबहुत्वद्वारम् ॥ अवतरण----इवे ला गाथाथी २४ दंडकमांथी कया दंरफना जीवो अल्प अने कया दंडकना जीवो अधिक छे, ? ते कहे छे.
. ॥ मूळ गाथा ४० मो. ॥ पजमणु बायरग्गी, वेमाणियभवणनिरयवंतरिया। जोइसचउ पण तिरिया, बेइंदि तेइंति भूमाऊ॥४०॥
॥ संस्कृतानुवादः ॥ पर्याप्तमनुजबादाग्निवैमानिकभवनपतिनैरयिक
व्यन्सरकाः। ज्योतिश्चतुष्कपञ्चेन्द्रियतिर्यचो द्वीन्द्रियत्रीन्द्रियभ्वापः ॥४०॥
शब्दरार्थः पज-पर्याप्त
नोइस-ज्योतिषीदेव मणु-मनुष्य
चउ-चतुरिन्द्रिय बायर-बादर
पण-पञ्चेन्द्रिय अग्गी-अग्नी
तिरिया-तिर्यचो वेमाणिय-वैमानिक
वेइंदि-दीन्द्रिय भवण-भवनपति
तेइंदि-त्रोन्द्रिय निरय-नारक
| भू-पृश्चिकाय वंतरीया-व्यंतरों | आऊ-अप्काय
- गाथार्थ:-पर्याप्तमनुष्य--बादर अग्नि-बैमानिक--भवनपति --नारक-व्यन्तर-ज्योतिषी- चतुरिन्द्रिय-पंचेन्द्रियतिर्यच--दीन्द्रिय -त्रीन्द्रिय-पृथ्विकाय-अप्काय ( संबन्ध आगळनी गाथा साथे.)
१ आगळ लघु अल्पाबहुत्व जुओ.