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॥ दंडकविस्तरार्थः ॥
अहसमितियं भणिस्सामि-हवे हुं हेतुबादोपदेशिकीदीर्घकालिकी-ने दृष्टिवादोपदेशिकी ए त्रण संज्ञाओमांनी कये दंडके केटली संज्ञाओ होय ते कहीश.
अवतरण-आ गाथामा दंडकाने विषे संज्ञाहार कहे छे.
॥मूळ गाथा ३२ मी.॥ चउविहसुरतिरिएसु, निरएसु य दोहकालिगी सन्ना विगले हेउवएसा, सन्नारहिया थिरा सव्वे ॥३२॥
॥संस्कृतानुवादः॥ चतुर्विधसुरतिया, नैरयिकेषु च दीर्घकालिकी संज्ञा । विकले हेतूपदेशिकी, संज्ञारहिताः स्थिराः सर्वे ॥३२॥
शब्दार्थः। चउविह-चार प्रकारना विगले-विकलेन्द्रियोमां सुर-देव
हेउवएसा-हेतुवादोपदेशिकी तिरिएसु-तियचोमां
संज्ञा निरएसु-नारकोमां
सन्नारहिया-संज्ञारहित य-अने
थिरा-स्थावरो दीदकालिगी-दीर्घकालिकी सम्वे-सर्वे
संज्ञा गाथार्थ:-चार प्रकारना देवो-तिर्यंचो-अने नारकोमां दीर्घकालिकी संज्ञा छे, विकलेन्द्रियोमा हेतुवादोपदेशिकी संज्ञा छे. अने सर्वे स्थावरो संज्ञारहित छे,
विस्तरार्थः-सुगम छे.