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॥ दंडविस्तरार्थः ॥ हवे दिशि आहारद्वारमा प्रथम छदिसिआहार होइ सव्वेसिं-सर्व दंडकमां छए दिशिथी आवेलो ओज आहार अने लोम आहार होय, कारणके सर्वे दंडकना जीवो लोकनी अंदरना भा. गमा रह्या छे, परन्तु विशेष ए छे के पणगाइ पए-पनक एटले सूक्ष्म वनस्पति इत्यादि पांच पदमां (--मू० वन० बन्ने वायु--मू० अग्नि सू० अपने सू० पृथ्विने ) भयणा-भजना एटले विकल्पे, अर्थात् छ दिशिनोज आहार होय एवो नियम नहिं परन्तु ६-५-०४--ने ३ दिशिनो आहार पण होइ शके, कारणके, ए जी वो लोकनी अंदरना भागमा अने लोकने अन्ते-किनारे पण रहेला छे. त्यां ६-५-४--३ दिशिनो आहार केवी रीते होय ? ते दर्शावाय छे
लोकना सर्वथी नीचेना छेल्ला प्रतरोमां निष्कुट स्थाने खूणे रहेला एकेन्द्रिय जीव नीचे अलोकाकाशनो व्याघात होवाथी पुद्गल द्रव्यना अभावे अधो दिशिनो आहार न ग्रहण करे, अने दिशिमां पण अलोकाकाशना व्याघाते पुद्गलागमन नहिं होवाथी खूणानी बे पासनी बे दिशाओमांथी पण आहार न मेळवी शके माटे लोकनी नीचे छेडे रहेला जीवने ३ दिशानोज आहार मळी शके, अने एज प्रमाणे लोकना सर्वोपरि अन्ते निष्कुटस्थाने खुणामां वर्तनो एकेन्द्रिय जीव बे दिशीथी अने ऊर्ध्व दिशीधी आहार न मेळ्वी शके माटे बे रीते ३ दिशिनो आहार एकेन्द्रि योने ज होय.
लोकना सर्वथी नीचेना छेल्ला प्रतरोमां निष्कुट स्थाने दि
१ एकेन्द्रियोना २२ भेदमांथी वायु ने प्रत्ये० वन - सिचायना ४ बादरो नहिं होवाथो १२ भेद लोकने अन्ते रह्याछे एम श्री भगवती जीमां क छे.ह्य