________________
६२
मूलाचारआगे निषेधिका व आसिकाको कहते हैं;कंदरपुलिणगुहादिसु पवेसकाले णिसिद्धिअं कुजा। तेहिंतो णिग्गमणे तहासिया होदि कायव्वा॥१३४॥ कंदरपुलिनगुफादिषु प्रवेशकाले निषेधिकां कुर्यात् । तेभ्यो निर्गमने तथा आसिका भवति कतेव्या ॥१३४ ॥
अर्थ-जलकर विदारे हुए प्रदेशरूप कंदर, जलके मध्यमें जलरहित प्रदेशरूप पुलिन, पर्वतके पसवाडेके छेदरूप गुफा इत्यादि निर्जतुक स्थानों में प्रवेश करनेके समय निषेधिका करे ।
और निकलनेके समय आसिका करे ॥ १३४ ॥ ___ आगे प्रश्न कैसे स्थानपर करना उसे कहते हैं;
आदावणादिगहणे सण्णा उभामगादिगमणे वा । विणयेणायरियादिसु आपुच्छा होदि कायव्वा॥१३५॥
आतापनादिग्रहणे संज्ञायां उद्धामकादिगमने वा । विनयेनाचार्यादिषु आपृच्छा भवति कर्तव्या ॥ १३५ ॥
अर्थ-व्रतपूर्वक उष्णका सहनारूप आतापनादि ग्रहणमें, आहारादिकी इच्छामें तथा अन्य ग्रामादिकको जानेमें नमस्कार पूर्वक आचार्यादि कोंको पूछना उनके कहे अनुसार करना वह आपृच्छा है ॥ १३५॥ __ आगे प्रतिपृच्छाको कहते हैं;- . जं किंचि महाकजं करणीयं पुच्छिऊण गुरुआदि । पुणरवि पुच्छदि साधुं तं जाणसु होदि पडिपुच्छा१३६
यत् किंचित् महाकार्य करणीयं पृष्ट्वा गुर्वादीन् । पुनरपि पृच्छति साधून तत् जानीहि भवति प्रतिपृच्छा१३६