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________________ ४३० मूलाचारतिण्हं खलुं पढमाणं उक्कस्सं अंतराययस्सेय । तीसं कोडाकोडी सायरणामाणमेव ठिदी॥१२३७॥ त्रयाणां खलु प्रथमानां उत्कृष्ट अंतरायस्यैव । त्रिंशत् कोटीकोव्यः सागरनाम्नामेव स्थितिः ॥ १२३७ ॥ अर्थ-पहले तीन ज्ञानावरणी दर्शनावरणी वेदनीय और अंतराय इन चार कर्मोंकी उत्कृष्टस्थिति (रहनेका काल) तीस कोड़ाकोडी सागर प्रमाण है ॥ १२३७ ॥ मोहस्स सत्तरं खलु वीसं णामस्स चेव गोदस्स । तेतीसमाउगाणं उवमाओ सागराणं तु ॥ १२३८॥ मोहस्य सप्ततिः खलु विंशतिः नाम्नः चैव गोत्रस्य । त्रयस्त्रिंशत् आयुष उपमाः सागराणां तु ॥ १२३८ ॥ अर्थ-मोहनीय मिथ्यात्वकी सत्तर कोडाकोड़ी है नामकर्म और गोत्रकर्मकी उत्कृष्टस्थिति वीस कोडाकोडी सागरोपम है और आयुकर्मकी उत्कृष्टस्थिति तेतीस सागरोपमकी है ॥१२३८॥ बारस य वेदणीए णामागोदाणमट्ठय मुहुत्ता। भिण्णमुहुत्तं तु ठिदी जहण्णयं सेस पंचण्हं ॥१२३९॥ द्वादश च वेदनीयस्य नामगोत्रयोरष्टौ मुहूर्ताः । भिन्नमुहूर्त तु स्थितिः जघन्या शेषाणां पंचानां ॥१२३९॥ अर्थ-वेदनीयकर्मकी जघन्यस्थिति बारहमुहूर्तकी है नाम और गोत्र इन दो कर्मोंकी आठ मुहूर्त है और बाकीके ज्ञानावरणादि पांच कर्मोंकी जघन्यस्थिति अंतर्मुहूर्तप्रमाण है ॥ १२३९ ॥ कम्माणं जो दुरसो अज्झवसाणजणिद सुह असुहोवा बंधो सो अणुभागो पदेसबंधो इमो होइ ॥ १२४० ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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