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पर्याप्ति-अधिकार १२। उच्चैर्नीचैर्गोत्रं दानं लाभोंतरायो भोगश्च । परिभोगो वीर्य चैव अंतरायश्च पंचविधः ॥ १२३४ ॥
अर्थ-उच्चगोत्र नीचगोत्र इसतरह गोत्रकर्मके दो भेद हैं। दानांतराय लाभांतराय भोगांतराय उपभोगांतराय वीर्यांतराय इसतरह अंतरायकर्मरूप मूलप्रकृतिके पांच भेद हैं ॥ १२३४ ॥ ऐसे १४८ प्रकृतियां हैं। सयअडयालपईणं बंध गच्छंति वीसअहियसयं । सव्वे मिच्छादिट्ठी बंधदि णाहारतित्थयरे ॥१२३५ ॥
शताष्टचत्वारिंशत्प्रकृतिनां बंधं गच्छंति विंशाधिकशतं । सर्वा मिथ्यादृष्टिः बध्नाति नाहारतीर्थकराः ॥ १२३५ ॥
अर्थ-एकसौ अड़तालीसकर्मप्रतियोंमेंसे एकसौ बीस प्रकृतियोंका ही बंध होता है अट्ठाईस अबंधप्रकृतियां हैं और उन एकसौ वीसमें आहारक शरीर आहारक अंगोपांग तीर्थकरत्व इन तीन प्रकृतियोंके सिवाय सभी एकसौ सत्रह प्रकृतियोंको मिथ्यादृष्टि बांधता है ॥ १२३५॥ वजिय तेदालीसं तेवण्णं चेव पंचवण्णं च । बंधइ सम्मादिट्ठी दु सावओ संजदो चेव ॥ १२३६॥
वर्जयित्वा त्रिचत्वारिंशत् त्रिपंचाशत् चैव पंचपंचाशच । बनाति सम्यग्दृष्टिस्तु श्रावकः संयतश्चैव ॥ १२३६ ॥
अर्थ-सम्यग्दृष्टि चौथे गुणस्थानवाला तेतालीस प्रकृतियोंको छोड़कर, श्रावक पांचवेंवाला त्रेपनको छोड़कर, संयमी प्रमत्त छठेवाला पचपनको छोड़कर अन्य सब प्रकृतियोंका बंध करता है ॥ १२३६ ॥