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________________ ४०२ मूलाचार हसौ वर्षके वाद होती है और चंद्रमा आदि ज्योतिषियोंके तथा नव भवनवासियोंके व्यंतरोंके सव देवियोंके अंतर्मुहूर्तके वाद आहारकी इच्छा है ॥ ११४६ ॥ उक्कस्सेणुस्सासो पक्खेणहिएण होइ भवणाणं । मुहुत्तपुधत्तेण तहा जोइसणागाण भोमाणं ॥११४७॥ उत्कृष्टेन उच्छासः पक्षणाधिकेन भवति भवनानां । मुहूर्तपृथक्त्वेन तथा ज्योतिष्कनागभौमानां ॥११४७ ॥ अर्थ-भवनवासी असुरोंके उत्कृष्टतासे उच्छास कुछ अधिक पखवाड़ासे होता है, और ज्योतिषी नागकुमारभवनवासियोंके व्यंतरोंके पृथक्त्व (चारसे आठ) अंतर्मुहूर्तके वाद है शेष भवनवासियोंके पूर्ववत् है ॥ ११४७ ॥ सक्कीसाणा पढमं विदियं तु सणकुमारमाहिंदा। बंभालंतव तदियं सुक्कसहस्सारया चउत्थी दु॥११४८ पंचमि आणदपाणद छट्ठी आरणचुदा य पस्संति । णवगेवजा सत्तमि अणुदिस अणुत्तरा य लोगं तं ॥ शनशानाः प्रथमं द्वितीयं तु सनत्कुमारमाहेंद्राः । ब्रह्मलांतवा तृतीयं शुक्रसहस्रारकाः चतुर्थी तु ॥११४८॥ पंचमी आनतप्राणताः षष्ठी आरणाच्युताश्च पश्यति । नवग्रैवेयकाः सप्तमी अनुदिशा अनुत्तराश्च लोकांत॥११४९॥ अर्थ-सौधर्म ऐशानदेव अपने अवधिज्ञानसे पहले नरकतक देखते हैं, सनत्कुमारमाहेंद्रदेव दूसरे तक, ब्रह्मलांतव दो युगलोके तीसरे नरकतक, शुक्र सहस्रार युगलोंके देव चौथे नरकतक देखते हैं । आनत प्राणत देव पांचवें तक आरण अच्युत
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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