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________________ पर्याप्ति-अधिकार १२। ४०१ ततः परतो नियमात् देवाः खलु भवंति निःप्रतीचाराः। सप्रतिचारेभ्योपि ते अनंतगुणसौख्यसंयुक्ताः ॥११४३ ॥ अर्थ-सोलहवें स्वर्गसे आगेके देव नियमसे कामसेवनसे रहित हैं परंतु कामसेवनवालोंसे अनंतगुणे सुखकर सहित हैं ११४३ जं च कामसुहं लोए जं च दिव्वं महासुहं । वीतरागसुहस्सेदे णंतभागंपि णग्घई ॥ ११४४ ॥ यच कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महासुखं । वीतरागसुखस्यैते अनंतभागमपि नार्हति ॥ ११४४॥ अर्थ-लोकमें विषयोंसे उत्पन्न सुख है और जो वर्गमेंका महासुख है ये सब वीतरागसुखके अनंतवें भागकी भी समानता नहीं करसकते ॥ ११४४ ॥ जदि सागरोपमाऊ तदि वाससहस्सियादु आहारो। पक्खेहिं दु उस्सासो सागरसमयेहिं चेव भवे॥११४५ यावत् सागरोपमायुः तावत् वर्षसहस्रः आहारः। पक्षैस्तु उच्छासः सागरसमयैश्चैव भवेत् ॥ ११४५ ॥ अर्थ-जितने सागरकी आयु है उतने ही हजारवर्षों के वाद देवोंके आहार है उतने ही पक्ष वीतनेपर श्वासोच्छ्रास है । ये सब सागरके समयोंकर होता है ॥ ११४५ ॥ उक्कस्सेणाहारो वाससहस्साहिएण भवणाणं । जोदिसियाणं पुण भिण्णमुहुत्तेणेदि सेस उक्कस्सं ॥ उत्कृष्टेन आहारो वर्षसहस्राधिकेन भवनानां । ज्योतिष्काणां पुनः भिन्नमुहूर्तेन इति शेषाणामुत्कृष्टं ॥ अर्थ-भवनवासी असुरोंके उत्कृष्ट भोजनकी इच्छा पंद्र २६ मूला०
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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