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________________ मूलाचार सानत्कुमार माहेंद्र देवोंके स्पर्शकर प्रतीचार है | ११३९ ॥ वंभे कप्पे बंभुत्तरे य तह लंतवे य कापिढे । एदेसु य जे देवा बोधव्वा रूवपडिचारा ॥। ११४० ॥ ब्रह्मे कल्पे ब्रह्मोत्तरे च तथा लांतवे च कापिष्टे । एतेषु च ये देवा बोद्धव्या रूपप्रतिचाराः ॥। ११४० ॥ अर्थ - ब्रह्मखर्ग ब्रह्मोत्तर लांतव कापिष्ट इन वर्गोंमें रहनेवाले देव रूपको देखनेसे ही कामसेवन के सुखको पाते हैं ऐसा जानना ॥ सुक्क महासुक्केसु य सदारकप्पे तहा सहस्सारे । कप्पे देसु सुरा बोधव्वा सद्दपडिचारा ॥। ११४१ ॥ शुक्रमहाशुक्रयोश्च शतार कल्पे तथा सहस्रारे । कल्पे एतेषु सुरा बोद्धव्याः शब्दप्रतिचाराः ॥ ११४१ ॥ अर्थ – शुक्र महाशुक्र शतार सहस्रारस्वर्ग इन चार वर्गों के देव देवांगनाओंके शब्द सुनने मात्रसे विषयसेवनकी प्रीतिको पाते हैं ॥ ११४१ ॥ ४००. आणदपाणदकप्पे आरणकप्पे य अच्चु य तहा । मणपडिचारा णियमा एदेमु य होंति जे देवा ।। ११४२ आनतप्राणतकल्पे आरणकल्पे च अच्युते च तथा । मनःप्रतीचारा नियमात् एतेषु च भवंति ये देवाः ॥११४२ अर्थ - आनत प्राणतस्वर्ग आरणस्वर्ग अच्युतस्वर्ग इन चारोंके देव नियमसे मनमें संकल्पमात्र हीसे कामसेवनका सुख पाते हैं ॥ ११४२ ॥ ततो परंतु णियमा देवा खलु होंति णिप्पडीचारा । सप्प डिचारेहिंवि ते अनंतगुणसोक्खसंजुत्ता ॥ ११४३॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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