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________________ पर्याप्ति - अधिकार १२ । ३९९ दोमें उत्कृष्ट पद्मलेश्या और जघन्य शुक्ललेश्या है, तेरहमें मध्यम शुक्ललेश्या है और चौदह विमानोंमें परमशुक्ल लेश्या है ॥ ११३५ - ११३६ ॥ एइंदियवियलिंदियअसण्णिणोतिण्णि होंति असुहाओ संकादीदाऊणं तिण्णि सुहा छप्पि सेसाणं ॥ ११३७ ॥ एकेंद्रियविकलेंद्रियासंज्ञिनां तिस्रो भवंति अशुभाः । संख्यातीतायुष्काणां तिस्रः शुभाः षडपि शेषाणां ॥ ११३७ अर्थ — एकेंद्री विककेंद्री असंज्ञीपंचेंद्रीके तीन अशुभ लेश्या होती हैं, असंख्यातवर्षकी आयुवाले भोगभूमिया कुभोग भूमिया जीवोंके तीन शुभ लेश्या हैं और बाकीके कर्मभूमिया मनुष्य तिर्यंचोंके छहों लेश्या होती हैं ।। ११३७ ॥ कामा दुवे तक भोग इंदियत्था विदूहिं पण्णत्ता । कामो रसो य फासो सेसा भोगेति आहीया ॥ ११३८ काम द्वौ यो भोगा इंद्रियार्था विद्भि प्रज्ञप्ताः । कामो रस स्पर्श शेषा भोगा इति आहिताः ।। ११३८ ॥ अर्थ-दो इंद्रियोंके विषय काम हैं तीन इंद्रियों के विषय भोग हैं ऐसा विद्वानोंने कहा है । रस और स्पर्श तो काम हैं और गंध रूप शब्द भोग हैं ऐसा कहा है ॥ ११३८ ॥ आईसाणा कप्पा देवा खलु होंति कायपडिचारा । फास पडिचारा पुण सणकुमारे य माहिंदे ॥ ११३९ ॥ आईशानात् कल्पात् देवाः खलु भवंति कायप्रतीचाराः । स्पर्शप्रतीचाराः पुनः सनत्कुमारे च माहेंद्रे ॥ ११३९ ॥ अर्थ — ईशान स्वर्गतकके देवोंके कायसे मैथुनसेवन है और
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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