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________________ मूलाचार पैशून्यहास्यकर्कशपरनिंदात्मप्रशंसाविकथादीन् । वर्जयित्वा खपरहितं भाषासमितिः भवेत् कथनम् ॥१२॥ . अर्थ-झूठादोषलगानेरूप पैशून्य, व्यर्थ हँसना, कठोर वचन, दूसरेके दोष प्रकट करनेरूप परनिंदा, अपनी प्रशंसा, स्त्रीकथा भोजनकथा राजकथा चोरकथा इत्यादिक वचनोंको छोड़कर अपने और परके हित करनेवाले वचन बोलना उसे भाषासमिति कहते हैं ॥१२॥ आगे एषणासमितिका खरूप बतलाते हैं;छादालदोससुद्धं कारणजुत्तं विसुद्धणवकोडी। सीदादी समभुत्ती परिसुद्धा एसणा समिदी ॥ १३ ॥ षट्चत्वारिंशद्दोषशुद्धं कारणयुक्तं विशुद्धनवकोटि । शीतादि समभुक्तिः परिशुद्धा एषणा समितिः ॥ १३॥ अर्थ-उद्गमादि छ्यालीस दोषोंकर रहित, भूखआदि मेंटना व धर्मसाधनआदि कारण युक्त, कृतकारित आदि नौ विकल्पोंसे विशुद्ध (रहित), ठंडा गर्म आदि भोजनमें रागद्वेषरहित-समभावकर भोजनकरना ऐसे आचरन करनेवाले संयमीके निर्मल एषणासमिति होती है ॥ १३ ॥ आगे आदाननिक्षेपणसमितिका खरूप कहते हैं;णाणुवहिं संजमुवहिं सौचुवहिं अण्णमप्पमुवहिं वा । पयदं गहणिक्खेवो समिदी आदाणणिक्खेवा ॥१४॥ ज्ञानोपधि संयमोपधिं शौचोपधिं अन्यमप्युपधिं वा । प्रयतं ग्रहनिक्षेपौ समितिः आदाननिक्षेपा ॥ १४ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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