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________________ पर्याप्ति-अधिकार १२। ३८९ देव नारकी और पंचेंद्रिय तियेचोंके चार चार लाख योनि हैं तथा मनुष्योंके चौदह लाख योनि हैं। सब मिलकर चौरासी लाख योनि हैं ॥ ११०४ ॥ बारसबाससहस्सा आऊ सुद्धेसु जाण उकस्सं । खरपुढविकायगेसु य वाससहस्साणि बावीसा॥११०५ द्वादशवर्षसहस्राणि आयुः शुद्धेषु जानीहि उत्कृष्टं । खरपृथिवीकायिकेषु च वर्षसहस्राणि द्वाविंशतिः॥११०५॥ अर्थ-मृत्तिका आदि शुद्ध पृथिवीकायिकोंकी आयु उत्कृष्ट बारह हजार वर्षकी है और पत्थर आदि खरपृथिवी कायिकोंकी बाईस हजार वर्षकी है। यहां सैंतीससौ तिहत्तरि उच्छासोंका एक मुहूर्त होता है ऐसा जानना ॥ ११०५ ॥ सत्त दु वाससहस्सा आऊ आउस्स होइ उक्कस्सं। रतिदिणाणि तिणि दु तेऊणं होइ उक्कस्सं ॥११०६॥ सप्त तु वर्षसहस्राणि आयुः अपां भवति उत्कृष्टं । रात्रिंदिनानि त्रीणि तु तेजसां भवति उत्कृष्टं ॥ ११०६ ॥ अर्थ-अप्कायिकोंका उत्कृष्ट आयु सात हजार वर्षका है और तेजकायिकोंका उत्कृष्ट आयु तीन दिनरातका है ॥११०६॥ तिणि दु वाससहस्सा आऊ वाउस्स होइ उकस्सं । दस वाससहस्साणि दु वणप्फद्दीणं तु उक्कस्सं॥११०७ त्रीणि तु वर्षसहस्राणि आयुः वायूनां भवति उत्कृष्टं । दश वर्षसहस्राणि तु वनस्पतीनां तु उत्कृष्टं ॥११०७॥ अर्थ-वायुकायिकोंका उत्कृष्ट आयु तीन हजार वर्ष है और वनस्पतीकायिकोंका उत्कृष्ट आयु दश हजार वर्षका है॥११०७॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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