SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 424
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ .. ३८७ ग१। पर्याप्ति-अधिकार १२। आगे योनिका खरूप वर्णन करते हैं;एइंदिय रइया संवुढजोणी हवंति देवा य। ' वियलिंदिया य वियडा संवुढवियडा य गन्भेसु१०९९ एकेंद्रिया नारका संवृतयोनयो भवंति देवाश्च । विकलेंद्रियाश्च विवृताः संवृतविवृताश्च गर्भेषु ॥ १०९९ ॥ अर्थ-सचित्त शीत संवृत अचित्त उष्ण विवृत सचित्ताचित्त शीतोष्ण संवृतविवृत इन भेदोंसे नौ प्रकारकी योनि अर्थात् उत्पत्तिस्थान हैं । एकेंद्री नारकी देव इनके संवृत (दुरुपलक्ष ) योनि है, दोइंद्रीसे चौइंद्रीतक विवृतयोनि है और गर्भजोंमें संवृतविवृत योनि है ॥ १०९९ ॥ अचित्ता खलु जोणी णेरइयाणं च होइ देवाणं । . मिस्सा य गन्भजम्मा तिविही जोणी दु सेसाणं११०० अचित्ता खलु योनिः नारकाणां च भवति देवानां । मिश्राश्च गर्भजन्मानः त्रिविधा योनिस्तु शेषाणां॥११००॥ अर्थ-अचित्त योनि नारकी और देवोंके होती है, गर्भजोंके मिश्र योनि होती है और शेष संमूर्छनोंके तीनों ही योनि होती हैं ॥ ११०० ॥ सीदुण्हा खलु जोणी रइयाणं तहेव देवाणं। तेऊण उसिणजोणी तिविहा जोणीदु सेसाणं॥११०१ शीतोष्णा खलु योनिः नारकाणां तथैव देवानां । तेजसां उष्णयोनिः त्रिविधा योनिस्तु शेषाणां ।।११०१॥ अर्थ-नारकी और देवोंके शीत उष्ण योनि हैं तेजकायिक
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy