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ग१।
पर्याप्ति-अधिकार १२। आगे योनिका खरूप वर्णन करते हैं;एइंदिय रइया संवुढजोणी हवंति देवा य। ' वियलिंदिया य वियडा संवुढवियडा य गन्भेसु१०९९
एकेंद्रिया नारका संवृतयोनयो भवंति देवाश्च । विकलेंद्रियाश्च विवृताः संवृतविवृताश्च गर्भेषु ॥ १०९९ ॥
अर्थ-सचित्त शीत संवृत अचित्त उष्ण विवृत सचित्ताचित्त शीतोष्ण संवृतविवृत इन भेदोंसे नौ प्रकारकी योनि अर्थात् उत्पत्तिस्थान हैं । एकेंद्री नारकी देव इनके संवृत (दुरुपलक्ष ) योनि है, दोइंद्रीसे चौइंद्रीतक विवृतयोनि है और गर्भजोंमें संवृतविवृत योनि है ॥ १०९९ ॥
अचित्ता खलु जोणी णेरइयाणं च होइ देवाणं । . मिस्सा य गन्भजम्मा तिविही जोणी दु सेसाणं११००
अचित्ता खलु योनिः नारकाणां च भवति देवानां । मिश्राश्च गर्भजन्मानः त्रिविधा योनिस्तु शेषाणां॥११००॥
अर्थ-अचित्त योनि नारकी और देवोंके होती है, गर्भजोंके मिश्र योनि होती है और शेष संमूर्छनोंके तीनों ही योनि होती हैं ॥ ११०० ॥ सीदुण्हा खलु जोणी रइयाणं तहेव देवाणं। तेऊण उसिणजोणी तिविहा जोणीदु सेसाणं॥११०१
शीतोष्णा खलु योनिः नारकाणां तथैव देवानां । तेजसां उष्णयोनिः त्रिविधा योनिस्तु शेषाणां ।।११०१॥ अर्थ-नारकी और देवोंके शीत उष्ण योनि हैं तेजकायिक