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________________ पर्याप्ति-अधिकार १२। ३७७ आणदपाणदकप्पे अद्भुद्धाओ हवंति रयणीओ। तिण्णेव य रयणीओ बोधव्वा आरणचुदो चापि१०६६ . आनतप्राणतकल्पे अध्यर्द्ध भवंति रत्नयः ।। त्रय एव च रत्नयो बोद्धव्या आरणाच्युतयोश्चापि ॥१०६६ अर्थ-आनत और प्राणत खर्गमें साढे तीन हाथ ऊंचे देव होते हैं तथा आरण अच्युत कल्पमें तीन हाथ प्रमाण होते हैं ॥ १०६६ ॥ हेहिमगेवज्झेसु य अड्डाइज्जा हवंति रयणीओ। मज्झिमगेवज्झेसु य बे रयणी होति उस्सेहो ॥१०६७ अधस्तनौवेयकेषु च सार्धद्वयं भवंति रत्नयः । मध्यमवेयकेषु च द्वौ रत्नी भवतः उत्सेधः ॥१०६७॥ अर्थ-अधोग्रैवेयक तीनमें अढाई हाथ उंचाई है और मध्यमप्रैवेयकतीनमें दो हाथ उंचाई है ॥ १०६७ ॥ उवरिमगेवज्झेसु य दिवड्डरयणी हवे य उस्सेधो। अणुदिसणुत्तरदेवा एया रयणी सरीराणि ॥१०६८॥ उपरिमौवेयकेषु च द्वयर्धरनिः भवेत् च उत्सेधः । अनुदिशानुत्तरदेवा एका रनिः शरीराः ॥१०६८ ॥ अर्थ-ऊपरके अवेयकत्रिकमें डेढ हाथ उंचाई है और नौ अनुदिश तथा पांच अनुत्तर विमानोंके देव एक हाथ ऊंचे शरीरवाले हैं ॥ १०६८ ॥ ___ आगे तिर्यंचोंके शरीरका प्रमाण कहते हैं;भागमसंखेजदिमं जं देहं अंगुलस्स तं देखें। एइंदियादिपंचेंदियंत देहं जहण्णण ॥ १०६९ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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