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________________ पर्याप्ति - अधिकार १२ । ३६९ आरंभकर अंतपर्यंत घटाना । इसीतरहका कथन गोंमटसारमें प्रमादके भंगों में विस्तारसे कहा है ।। १०४० ॥ एवं सीलगुणाणं सुत्तत्थवियप्पदो वियाणित्ता । जो पालेदि विसुद्धो सो पावदि सव्वकल्लाणं ॥१०४१ एवं शीलगुणानां सूत्रार्थविकल्पतः विज्ञाय | यः पालयति विशुद्धः स प्राप्नोति सर्वकल्याणं ॥ १०४१ ॥ अर्थ - इस प्रकार शील और गुणोंको सूत्र अर्थ और भेदोंसे जानकर जो पुरुष पालता है वह कर्मोंसे रहित हुआ मोक्षको पाता है ॥ १०४ ॥ इसप्रकार आचार्यश्रीवट्टकेरिविरचित 'मूलाचारकी हिंदीभाषाटीका में शील और गुणोंको कहनेवाला ग्यारवां शीलगुणाधिकार समाप्त हुआ ॥ ११ ॥ पर्याप्ति-अधिकार ॥ १२ ॥ आगे मंगलाचरणपूर्वक पर्याप्ति कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं:काऊण णमोक्कारं सिद्धाणं कम्मचक्कमुक्काणं । पज्जत्ती संगहणी वोच्छामि जहाणुपुव्वीयं ॥ १०४२ ॥ कृत्वा नमस्कारं सिद्धेभ्यः कर्मचक्रमुक्तेभ्यः । पर्याप्तिसंग्रहिणीं वक्ष्ये यथानुपूर्वम् ॥ १०४२ ॥ अर्थ — कर्मरूपी चक्र से छूटे हुए ऐसे सिद्धों को नमस्कार २४ मूला •
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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