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________________ ३६८ मूलाचार तीन वार स्थापे । इस तरह एक पिंडके ऊपर दूसरा स्थापन करनेसे प्रस्तार होता है । इसीतरह अन्य भी पिंड कर लेना १०३७ पढमक्खो अंतगदो आदिगदे संकमेदि बिदियक्खो। दोषिणवि गंतूणंतं आदिगदे संकमेदि तदियक्खो॥ प्रथमाक्षः अंतगत आदिगते संक्रामति द्वितीयाक्षः । द्वावपि गत्वांतं आदिगते संक्रामति तृतीयाक्षः ॥१०३८॥ अर्थ-प्रथमभेद अंतको प्राप्त हो उसके वाद आदिको प्राप्त होनेपर द्वितीय अक्ष ( करणरूप भेद ) पलटता है उसके वाद दोनों अक्ष अंतको प्राप्त होकर आदिको प्राप्त हों तब तीसरा अक्ष पलटता है । इसतरह अन्य अक्ष भी जानना ॥ १०३८ ॥ सगमाणेहिं विहत्ते सेसं लक्खित्तु संखिवे रुवं । लक्खिजंतं सुद्धे एवं सव्वत्थ कायव्वं ॥ १०३९ ॥ खकमानैः विभक्ते शेष लक्षयित्वा संक्षिपेत् रूपं । लक्षिणमंते शुद्ध एवं सर्वत्र कर्तव्यं ॥ १०३९ ॥ अर्थ-अपने प्रमाण योगादिकोंसे भाग देनेपर शेषको जान एक मिलाये भाग देनेपर कुछ न रहे तो अक्ष अंतमें स्थित हुआ । इसप्रकार सब जगह शील गुणोंमें करना योग्य है॥१०३९ संठाबिदूण एवं उवरीदो संगुणित्तु सगमाणे। अवणिज अणंकिदयं कुज्जा पढमंति याचेव ॥१०४०॥ संस्थाप्य रूपं उपरितः संगुणय्य स्वकमानैः । अपनीय अनंकितं कुर्यात् प्रथमांतं यावच्चैव ॥१०४० ॥ अर्थ-एकको स्थापन कर ऊपरसे आरंभकर अपने प्रमाणसे गुणें जो प्रमाण हो उसमें अनंकित स्थानका प्रमाण ‘प्रथमको
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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