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________________ ३६७ शीलगुणाधिकार ११ । अर्थ-शील और गुणोंकी संख्या प्रस्तार अक्षसंक्रम नष्ट उद्दिष्ट-ये पांच वस्तु जाननी ॥ १०३४ ॥ सव्वेपि पुव्वभंगा उवरिमभंगेसु एक्कमेकेसु । मेलंतेत्तिय कमसो गुणिदे उप्पजदे संखा ॥१०३५ ॥ सर्वानपि पूर्वभंगान् उपरि भंगेषु एकमेकं । मेलयित्वा क्रमशो गुणिते उत्पद्यते संख्या ॥ १०३५॥ अर्थ-शील गुणोंके सभी पूर्वभेदोंको ऊपरले भंगोंमें मिलाके एक एकको क्रमसे गुणा करनेपर दोनोंकी संख्या वनजाती है ॥ पढमं सीलपमाणं कमेण णिक्खिविय उवरिमाणं च । पिंडं पडि एकेक णिक्खित्ते होइ पत्थारो ॥१०३६॥ प्रथमं शीलप्रमाणं क्रमेण निक्षिप्य उपरि मानं च । पिंडं प्रति एकमेकं निक्षिप्ते भवति प्रस्तारः ॥१०३६ ॥ अर्थ-प्रथम जो मनवचनकायका त्रिक वह शीलप्रमाण है उसे विरल नकर ( जुदा जुदा एक एक वखेर ) पीछे क्रमसे एक एक भेद प्रति एक एक ऊपरका तीनकरणरूप पिंड स्थापनकरना इस तरह पिंडके प्रति एक एक रखनेसे प्रस्तार होता है।।१०३६॥ यह सम प्रस्तार कहा । अब विषम प्रस्तार कहते हैं;णिक्खित्तु बिदियमेत्तं पढमं तस्सुवरि बिदियमेकेक । पिंडं पडि णिक्खित्ते तहेव सेसावि काव्वा ॥१०३७ निक्षिप्य द्वितीयमानं प्रथमं तस्योपरि द्वितीयमेकैकं । पिंडं प्रति निक्षिप्ते तथैव शेषा अपि कर्तव्याः ॥१०३७॥ अर्थ-प्रथम मनवचनकायत्रिकको द्वितीयत्रिकमात्र तीन वार स्थापि उसके ऊपर दूसरा करणत्रिक एक एक द्वितीय प्रमाण
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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