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________________ शीलगुणाधिकार ११। शीलगुणाधिकार ॥ ११ ॥ आगे मंगलाचरणपूर्वक शीलगुण कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं;सीलगुणालयभूदे कल्लाणविसेसपाडिहेरजुदे। वंदित्ता अरहंते सीलगुणे कित्तइस्सामि ॥ १०१६ ॥ शीलगुणालयभूतान् कल्याणविशेषप्रातिहार्ययुतान् । वंदित्वा अर्हतः शीलगुणान् कीर्तयिष्यामि ॥ १०१६ ॥ अर्थ-व्रतकी रक्षारूप शील और संयमके भेदरूप गुण इनके आधारभूत तथा पंच कल्याण चौंतीस अतिशय आठ प्रातिहार्योंकर सहित ऐसे अहंत भगवानको नमस्कार करके अब मैं शील और गुणोंको कहता हूं ॥ १०१६ ॥ ___ अब शीलोंके भेद कहते हैं;जोए करणे सण्णा इंदिय भोम्मादि समणधम्मे य । अण्णोण्णेहिं अभत्था अट्ठारहसीलसहस्साई ॥१०१७ योगाः करणानि संज्ञा इंद्रियाणि भ्वादयः श्रमणधर्मश्च । अन्योन्यं अभ्यस्ता अष्टादशशीलसहस्राणि ॥ १०१७॥ अर्थ-तीन योग तीन करण चार संज्ञा पांच इंद्रिय दश पृथिव्यादिक काय, दश मुनि धर्म-इनको आपसमें गुणा करनेसे अठारह हजार शील होते हैं ॥ १०१७ ॥ तिण्हं सुहसंजोगो जोगो करणं च असुहसंजोगो। आहारादी सण्णा फासंदिय इंदिया णेया॥१०१८॥ त्रयाणां शुभसंयोगो योगः करणं च अशुभसंयोगः। आहारादयः संज्ञाः स्पर्शनादयः इंद्रियाणि ज्ञेयानि १०१८
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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