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________________ ३६० मूलाचारयतं मुंजीत भाषेत एवं पापं न बध्यते ॥ १०१३ ॥ अर्थ-यत्नाचारसे ( ईर्यापथशुद्धिसे ) गमन करे, महाव्रतादि यनसे तिष्ठे, पीछीसे शोधकर बैठे, सोधकर रात्रिमें एक पार्श्वसे सोवे, दोषरहित आहार करे, भाषासमितिके क्रमसे बोले-इस प्रकारसे पाप नहीं बंध सकता ॥ १०१३ ॥ जदं तु चरमाणस्स दयापेहुस्स भिक्खुणो। णवं ण बज्झदे कम्मं पोराणं च विधूयदि ॥१०१४॥ .. यत्नेन तु चरतः दयारोक्षिणो भिक्षोः। नवं न बध्यते कर्म पुराणं च विधूयते ॥१०१४ ॥ अर्थ-यत्नसे आचरण करते और दया पालते हुए साधुके नवीन कर्म तो बंधता ही नहीं और पुराने कर्म भी क्षय होते जाते हैं ॥ १०१४ ॥ एवं विधाणचरियं जाणित्ता आचरिज जो भिक्खू । णासेऊण दु कम्मं दुविहंपि य लहु लहइ सिद्धिं १०१५ एवं विधानचरितं ज्ञात्वा आचरेत् यो भिक्षुः। नाशयित्वा तु कर्म द्विविधमपि च लघु लभते सिद्धिं १०१५ अर्थ-इसप्रकार क्रियाके अनुष्ठानको जानकर जो मुनि आचरण करता है वह साधु शुभ अशुभ दोप्रकारके कर्मोंका नाशकर शीघ्र ही मोक्षको पाता है ॥ १०१५ ॥ इसप्रकार आचार्यश्रीवट्टकेरिविरचित मूलाचारकी हिंदीभाषाटीकामें समयके सारको कहनेवाला दशवां समयसाराधिकार समाप्त हुआ॥ १० ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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