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________________ समयसाराधिकार १०। ३५९ उपलब्धपुण्यपापस्य तस्योपस्थापना अस्ति ॥ १०१०॥ अर्थ-जो जिनदेवकर कहे गये पृथिवीकायिक जीवोंका अत्यंत श्रद्धान करता है पुण्यपाप जाननेवाले उस पुरुषके मोक्षमार्गमें स्थिति अवश्य है ॥ १०१० ॥ ण सद्दहदि जो एदे जीवे पुढविदं गदे । स गच्छे दिग्घमद्धाणं लिंगत्थोबि हु दुम्मदी ॥१०१.१ न श्रद्दधाति य एतान् जीवान् पृथिवीत्वं गतान् । स गच्छेत् दीर्घमध्वानं लिंगस्थोपि हि दुर्मतिः १०११ ॥ अर्थ-जो पृथिवीपनेको प्राप्त हुए जीवोंका श्रद्धान नहीं करता वह ननत्व चिन्हकर सहित भी दुर्बुद्धि दीर्घ संसारको प्राप्त होता है ॥ १०११॥ . कधं चरे कधं चिढे कधमासे कधं सये। कधं भुंजेज भासिज कधं पावं ण वज्झदि ॥१०१२ कथं चरेत् कथं तिष्ठेत् कथमासीत कथं शयीत । कथं झुंजीत भाषेत कथं पापं न बध्यते ॥ १०१२ ॥ अर्थ-इस प्रकार कहे गये क्रमकर जीवोंसे भरे जगतमें साधु किसतरह गमन करे, कैसे तिष्ठे, कैसे बैठे, कैसे सोये, कैसे भोजन करे, कैसे बोले, किस तरह पापसे न बंधे ? ऐसा शिष्यने प्रश्न किया ॥ १०१२ ॥ ___ अब उसका उत्तर कहते हैंजदं चरे जदं चिट्टे जदमासे जदं सये। जदं भुंजेज भासेज एवं पावं ण बज्झई ॥१०१३ ॥ यतं चरेत् यतं तिष्ठेत् यतमासीत यतं शयीत ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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