SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 390
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ समयसाराधिकार १० । बीहेदव्वं णिचं कत्थस्सवि तहित्थिरूवस्स । हवदि य चित्तक्खोभो पच्चयभावेण जीवस्स ॥ ९९० ॥ भेतव्यं नित्यं काष्ठस्थादपि तथा स्त्रीरूपात् । भवति च चित्तक्षोभः प्रत्ययभावेन जीवस्य ॥ ९९० ॥ अर्थ - काठसे बने हुए भी स्त्रीरूपसे सदा डरना चाहिये क्योंकि कारणवशसे जीवका मन चलायमान होजाता है ॥ ९९० ॥ घिदभरिदघडस रित्थो पुरिसो इत्थी बलंत अग्गिसमा । तो. महिलेयं दुक्का णट्ठा पुरिसा सिवं गया इदरे ॥ ९९१ ३५३ घृतभृतघटसदृशः पुरुषः स्त्री ज्वलदग्निसमा । तां महिलामंतं ढौकिता नष्टाः पुरुषाः शिवं गता इतरे९९१ अर्थ - पुरुष घीसे भरे हुए घड़े के समान है, और स्त्री जलती हुई आग के समान है जो पुरुष स्त्रीके समीपको प्राप्त हुए वे नाशको प्राप्त हुए और जो नहीं प्राप्त हुए वे मोक्षको गये ॥ ९९९ मायाए वहिणीए धूआए मूइय वुड्ड इत्थीए । बीहेदव्वं णिचं इत्थीरूवं णिरावेक्खं ॥ ९९२ ॥ मातुः भगिन्या दुहितुः मूकाया वृद्धायाः स्त्रियाः । भेतव्यं नित्यं स्त्रीरूपं निरपेक्षं ।। ९९२ ।। अर्थ - माता बहिन पुत्री गूंगी वुड्डी ऐसी स्त्रीसे सदा डरना चाहिये । क्योंकि स्त्रीका रूप देखनेयोग्य नहीं है ॥ ९९२ ॥ 1 हत्थपादपरिच्छिण्णं कण्णणासवियप्पियं । अविवास सदिं णारिं दूरिदो परिवज्जए ॥ ९९३ ॥ हस्तपादपरिच्छिन्नां कर्णनासाविकल्पितां । अविवाससं सतीं नारीं दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ९९३ ॥ २३ मूला०
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy