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________________ ३५४ मूलाचार अर्थ — हाथकर छिन्न पांवसे छिन्न कानसे बहिरी नाकसे हीन वस्त्ररहित ( नंगी ) ऐसी भी स्त्रीको दूरसे त्याग देना चाहिये || मण बंभचेर वचि बंभचेर तह काय बंभचेरं च । अहवा हु बंभचेरं दव्वं भावं ति दुवियप्पं ॥ ९९४ ॥ मनसि ब्रह्मचर्यं वचसि ब्रह्मचर्यं तथा कार्य ब्रह्मचर्यं च । अथवा हि ब्रह्मचर्यं द्रव्यं भावमिति द्विविकल्पं ॥ ९९४ ॥ अर्थ — मनमें ब्रह्मचर्य वचनमें ब्रह्मचर्य और कायमें ब्रह्मचर्य - ऐसे तीनप्रकार ब्रह्मचर्य है अथवा प्रगटपने द्रव्य भावके भेदसे दोतरहका है ॥ ९९४ ॥ भावविरदो दु विरदो ण दव्वविरदस्स सुग्गई होई । विसयवणरमणलोलो धरियव्वो तेण मणहत्थी ॥९९५ भावविरतस्तु विरतो न द्रव्यविरतस्य सुगतिः भवति । विषयवनरमणलोलो धारयितव्यः तेन मनोहस्ती ॥ ९९५ ॥ अर्थ — जो अंतरंगमें विरक्त है वही विरक्त है बाह्यवृत्तिसे विरक्त होनेवालेकी शुभगति नहीं होती । इसलिये मनरूपी हाथी जोकि विषयवन में क्रीडालंपट है उसे रोकना चाहिये ॥ ९९५ पढमं विउलाहारं बिदियं काय सोहणं । तदियं गंधमल्लाई उत्थं गीयवाइयं ॥ ९९६ ॥ तह सयणसोधणंपि य इत्थिसंसग्गंपि अत्थसंग्रहणं । पुव्वर दिसरणमिंदियविसयरदी पणीदरससेवा ॥ ९९७ दसविहमव्वंभविणं संसारमहा दुहाणमावाहं । परिहरह जो महप्पा सो दढबंभव्वदो होदि ॥ ९९८ ॥ प्रथमं विपुलाहारः द्वितीयं कायशोधनं ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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