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________________ ३४८ मूलाचारअर्थ-ज्ञानावरणादि कर्मके बंध मोक्षको, जीव अजीव द्रव्योंको तथा उनकी पर्यायोंको और संसार तथा शरीरको भोगोंसे विरक्त हुआ मुनि ध्यावे ॥ ९७४ ॥ दव्वे खेत्ते काले भावे य भवे य होंति पंचेव । परिवणाणि वहुसो अणादिकाले य चिंतेजो ॥९७५॥ द्रव्यं क्षेत्रं कालो भावश्च भवश्च भवंति पंचैव । परिवर्तनानि बहुशः अनादिकाले च चिंतयेत् ॥ ९७५ ॥ अर्थ-द्रव्यपरिवर्तन क्षेत्रपरिवर्तन कालपरिवर्तन भावपरिवर्तन भवपरिवर्तन-ये पांच परिवर्तन इस जीवने अनादिकालसे लेकर अनेकवार किये ऐसा चितवन करना चाहिये ॥ ९७५ ॥ मोहग्गिणा महंतेण दज्झमाणे महाजगे धीरा । समणा विसयविरत्ता झायंति अणंतसंसारं ॥९७६॥ मोहानिना महता दह्यमानं महाजगत् धीराः । श्रमणा विषयविरक्ता ध्यायंति अनंतसंसारं ॥ ९७६ ॥ अर्थ-महान् मोहरूपी अग्निसे जलते हुए सब लोकको देखकर विषयोंसे विरक्त धीरमुनि अनंतसंसारके खरूपका चितवन करते हैं ॥ ९७६ ॥ आरंभं च कसायं च ण सहदि तवो तहा लोए। अच्छी लवणसमुद्दो य कयारं खलु जहा दिटुं॥९७७ आरंभं च कषायान् च न सहते तपस्तथा लोके । अक्षि लवणसमुद्रश्च कचारं खलु यथा दृष्टम् ॥ ९७७ ॥ अर्थ-जैसे नेत्र और लवणसमुद्र तृणादि कूड़ेको नहीं सहन करते तटस्थ करदेते हैं उसीतरह लोकमें तप ( चारित्र )
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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