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________________ समयसाराधिकार १०। दुविहा चावि दुगंछा लोइय लोगुत्तरा चेव ॥ ९४६ ॥ व्यवहारशोधनाय परमार्थाय तथा परिहरतु । द्विविधा चापि जुगुप्सा लौकिकी लोकोत्तरा चैव ॥९४६॥ अर्थ-लौकिकी ग्लानि तथा लोकोत्तरा जुगुप्सा इन दोनोंको व्यवहारशुद्धि सूतक आदिके शोधनके लिये तथा रत्नत्रयकी शुद्धिके लिये छोड़ना चाहिये ॥ ९४६ ॥ परमट्टियं विसोहिं सुट्ट पयत्तेण कुणइ पव्वइओ। परमट्ठदुगंछा विय सुट्ट पयत्तेण परिहरउ ॥ ९४७ ॥ परमार्थिकां विशुद्धिं सुष्टु प्रयत्नेन करोति प्रबजितः । परमार्थजुगुप्सापि च सुष्ठ प्रयत्नेन परिहरतु ॥ ९४७॥ अर्थ-साधु रत्नत्रयशुद्धिको भले यत्नकर करे और शंकादि ग्लानिको अच्छी तरह यत्नसे त्याग दे ॥ ९४७ ॥ संजममविराधंतो करेउ ववहारसोधणं भिक्खू । ववहारदुगंछावि य परिहरउ वदे अभंजंतो ॥ ९४८ ॥ संयममविराधयन् करोतु व्यवहारशोधनं भिक्षुः । व्यवहारजुगुप्सामपि च परिहरतु व्रतानि अभंजयन् ॥९४८ अर्थ-साधु चारित्रको नहीं भंग करता व्यवहारशुद्धिको करनेवाले प्रायश्चित्तको करे और अहिंसादि व्रतोंको भंग न करके व्यवहारनिंदाको भी छोड़े ॥ ९४८ ॥ जत्थ कसायुप्पत्तिरभत्तिंदियदारइत्थिजणबहुलं । दुक्खमुवसग्गबहुलं भिक्खू खेत्तं विवजेऊ ॥ ९४९ ॥ यत्र कषायोत्पत्तिरभक्तिरिंद्रियद्वारस्त्रीजनबाहुल्यं । दुःखमुपसर्गबहुलं भिक्षुः क्षेत्रं विवर्जयेत् ॥ ९४९ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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