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________________ ३३३ समयसाराधिकार १०। जो भुंजदि आधाकम्मं छज्जीवाण घायणं किच्चा। अबुहो लोल सजिब्भोणवि समणो सावओ होज९२७ यो भुंक्ते अधःकर्म षट्जीवानां घातनं कृत्वा ।। अबुधो लोलः सजिह्वः नापि श्रमणः श्रावकः भवेत्॥९२७ अर्थ-जो मूढमुनि छहकायके जीवोंका घात करके अधः कर्मकर सहित भोजन करता है वह लोलपी जिह्वाके वश हुआ मुनि नहीं है श्रावक है ॥ ९२७ ॥ पयणं व पायणं वा अणुमणचित्तो ण तत्थ बीहेदि । जेमंतोवि सघादी णवि समणो दिहिसंपण्णो ॥९२८॥ पचने वा पाचने वा अनुमनचित्तो न तत्र विभेति । जेमंतोपि स्वघाती नापि श्रमणः दृष्टिसंपन्नः ॥ ९२८ ॥ अर्थ-पाक करनेमें अथवा पाक करानेमें पांचउपकरणोंसे अधःकर्ममें प्रवृत्त हुआ और अनुमोदनामें प्रसन्न जो मुनि उस पचनादिसे नहीं डरता वह मुनि भोजन करता हुआ भी आत्मघाती है । न तो मुनि है और न सम्यग्दृष्टि है ॥ ९२८ ॥ ण हु तस्स इमो लोओ णवि परलोओत्तमट्ठभट्ठस्स। लिंगग्गहणं तस्स दुणिरत्थयं संजमेण हीणस्स ९२९ न हि तस्य अयं लोकः नापि परलोक उत्तमार्थभ्रष्टस्य । लिंगग्रहणं तस्य तु निरर्थकं संयमेन हीनस्य ॥ ९२९ ॥ अर्थ-जो चारित्रसे भ्रष्ट है उसमुनिके यह लोक भी नहीं और परलोक भी नहीं । संयमरहित उस मुनिके मुनिलिंगका धारण करना व्यर्थ है ॥ ९२९ ॥ पायच्छित्तं आलोयणं च काऊण गुरुसयासह्मि ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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