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________________ ३२० मूलाचारउद्यमी व्रतादियुक्त ज्ञान मूलगुणसहित हुआ जो मुनि करता है वह उत्तम स्थानको प्राप्त होता है ॥ ८८८ ॥ भत्तीए मए कधिदं अणयाराणत्थवं समासेण । जो सुणदि पयदमणसो सो गच्छदि उत्तमं ठाणं८८९ भक्त्या मया कथितं अनगाराणां स्तवं समासेन । यः शृणोति प्रयत्तमनाः स गच्छति उत्तमं स्थानं ॥८८९॥ अर्थ-भक्ति सहित संक्षेपसे मुझसे कहे गये अनगारोंके स्तवनको जो कोई संयमी हुआ सुनता है वह उत्तम स्थानको पाता है ॥ ८८९॥ एवं संजमरासिं जो काहदि संजदो ववसिदप्पा । दंसणणाणसमग्गो सो गाहदि उत्तमं ठाणं ॥ ८९०॥ एवं संयमराशिं यः करोति संयतो व्यवसितात्मा । दर्शनज्ञानसमग्रः स गच्छति उत्तमं स्थानं ॥ ८९० ॥ अर्थ-जो संयमी उद्यमी संयमराशिको इस प्रकार पालन करता हैं वह दर्शन ज्ञानकर पूर्ण हुआ उत्तम स्थानको पाता है ॥ ८९० ॥ एवं मए अभिथुदा अणगारा गारवेहिं उम्मुक्का। घरणिधरेहिं य महिया देंतु समाहिं च बोधि च॥८९१ एवं मया अभिस्तुता अनगारा गौरवैः उन्मुक्ताः। धरणिधरैः च महिता ददतु समाधिं च बोधिं च ॥८९१॥ अर्थ-इस प्रकार ऋद्धि आदिके गौरवरहित राजाओंकर पूज्य ऐसे अनगारोंकी मैंने भी स्तुति की है ऐसे अनगार
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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