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मूलाचार
अनिवृत्ति गुणस्थानको प्राप्त हुए मुनिराजको फिर कषाय पीडा नहीं देसकते ॥ ८८३ ॥ जह ण चलइ गिरिरायो अबरुत्तरपुव्वदक्खिणेवाए। एवमचलिदो जोगी अभिक्खणं झायदे झाणं ॥८८४॥ यथा न चलति गिरिराजः अपरोत्तरपूर्वदक्षिणवातैः ।
एवमचलितो योगी अभीक्ष्णं ध्यायति ध्यानं ॥ ८८४ ॥ .. अर्थ-जैसे सुमेरु पर्वत पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तर दिशाओंकी हवासे स्थानसे चलायमान नहीं होता उसीतरह सब कष्टोंसे अकंपभाववाला मुनि सदा उत्तमध्यानको ध्याता है ।। ८८४ ॥ णिट्टविदकरणचरणा कम्मं णिद्धृद्धदं धुणित्ताय । जरमरणविप्पमुक्का उति सिद्धिं धुदकिलेसा ॥८८५॥ निष्ठापितकरणचरणाः कर्म निधनोद्धतं धृत्वा । जरामरणविप्रमुक्ता उपयांति सिद्धिं धुतक्लेशाः ॥ ८८५ ॥
अर्थ—उसके बाद चारित्र और आवश्यकादि करण परमोत्कृष्ट जिनोंने किये ऐसे मुनि अत्यंत दुःखदायी कर्मोंको निर्मूल नाशकर नष्टक्लेशवाले हुए तथा जरामरणसे रहित हुए अनंत ज्ञानादिरूप अवस्थाको पाते हैं ॥ ८८५॥ ___ आगे अनगारके पर्यायवाची नामोंको कहते हैं;समणोत्ति संजदोत्ति य रिसिमुणिसाधुत्ति वीद
रागोत्ति। णामाणि सुविहिदाणं अणगार भदंत दंतोत्ति ॥८८६
श्रमण इति संयत इति च ऋषिमुनिसाधव इति वीतराग इति । नामानि सुविहितानां अनगारो भदंतः दांतो यतिः॥८८६