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________________ ३०६ मूलाचारकायमलं मस्तुलिंग दंतमलं विचिक्यं गलितस्वेदं । कृमिजंतुदोषभृतं स्यंदनीयकर्दमसदृशम् ॥ ८४७॥ अर्थ-मलमूत्रादि माथेका सफेदद्रव्यरूप मैल दांतका मैल नेत्रमल झरता पसीना इनकर सहित लट आदि त्रसजीवोंकर भरा वातपित्तकफरूप दोषोंसे भरा ऐसा यह शरीर दुर्गंधयुक्त कीचके समान है ॥ ८४७ ॥ अडिंच चम्मं च तहेव मंसं पित्तं च सेंभंतह सोणिदं च। अमेज्झसंघायमिणं सरीरं पस्संति णिव्वेदगुणाणुपेही॥ अस्थीनि च चर्म च तथैव मांसं पित्तं च श्लेष्मा तथा शोणितं च अमेध्यसंघातमिदं शरीरं पश्यति निर्वेदगुणानुप्रेक्षिणः८४८ अर्थ-संसार शरीर भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हुए मुनि इस शरीरको ऐसा देखते हैं कि हड्डी चमड़ा मांस पित्त कफ लोही इत्यादि अपवित्र वस्तुका समूहरूप यह शरीर है ।। ८४८ ॥ अहिणिछण्णं णालिणिबद्धं कलिमलभरिदं किमि . उलपुण्णं । मंसविलित्तं तयपडिछण्णं सरीरघरंतंसददमचोक्खं॥ अस्थिनिछन्नं नालिनिबद्धं कलिमलभृतं कृमिकुलपूर्ण । मांसविलिप्तत्वप्रतिच्छन्नं शरीरगृहं तत्सततमचौख्यं८४९ अर्थ-यह शरीररूपी घर हांडोंकर मढा नसोंकर बंधा अशुचिद्रव्योंकर पूर्ण कृमिके समूहकर भरा मांसकर लिपा चमडेसे ढका हुआ है इसलिये हमेशा अशुचि है ॥ ८४९ ॥ एदारिसे सरीरे दुग्गंधे कुणिवदियमचोक्खे । सडणपडणे असारे रागंण करिति सप्पुरिसा॥८५०॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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