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अनगारभावनाधिकार ९। ३०५ अंतोछाइदढिड्डिस खिन्भिसभरिदं अमेज्झघरं ॥८४४॥ एतत् शरीरमशुचि नित्यं कलिकलुषभाजनमशुभं । अंतश्छादितढिड्डिसं किल्बिषभृतं अमेध्यगृहं ॥ ८४४॥
अर्थ-यह शरीर सदा अपवित्र है रागद्वेषका पात्र है सुखके लेशकर रहित है कपास समान मांस वसा अंतरंगमें होनेसे चामकर ढका हुआ है वीर्य रुधिर आदि अशुचि वस्तुओंकर भरा है और मलमूत्रका घर है ॥ ८४४ ॥ वसमजामंससोणियपुप्फसकालेजसिंभसीहाणं । सिरजालअढिसंकड चम्में णद्धं सरीरघरं ॥ ८४५॥
वसामजामांसशोणितपुष्पसकालेजश्लेष्मसिंहाणं । सिराजालास्थिसंकीर्ण चर्मणा नद्धं शरीरगृहं ॥ ८४५ ॥
अर्थ-वसा मजा मांस लोही झागसमान पोफस कलेजा ( अति काले मांसका टुकड़ा ) कफ नाकका मल नसाजाल हाड इनकर भरा हुआ और चामकर मढा हुआ यह शरीरघर है।।८४५ वीभच्छं विछुइयं थूहायसुसाणवच्चमुत्ताणं । अंसूयपूयलसियं पयलियलालाउलमचोक्खं ॥ ८४६॥ बीभत्सं विशौचं थूत्कारसुसाणव!मूत्रैः। अश्रुपूतलसितं प्रगलितलालाकुलं अचौख्यं ॥ ८४६ ॥ अर्थ-यह शरीर डरावना है थूक नासिकामल गू मूत्र इनकर ग्लानिसहित है आंसू राधिकर सहित झरती हुई लारसे ग्लानिरूप है इसलिये अपवित्र है ॥ ८४६ ॥ कायमलमत्थुलिंगं दंतमल विचिक्कणं गलिदसेयं । किमिजंतुदोसभरिदं सेंदणियाकद्दमसरिच्छं ॥ ८४७॥
२० मूला.