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________________ अनगारभावनाधिकार ९। २९७ पयणं व पायणं वा ण करेंति अणेव ते करावेंति । पयणारंभणियत्ता संतुट्ठा भिक्खमेत्तेण ॥ ८१९॥ पचनं वा पाचनं वा न कुर्वेति च नैव ते कारयति । पचनारंभनिवृत्ताः संतुष्टा भिक्षामात्रेण ॥ ८१९ ॥ अर्थ-आप पकाना दूसरेसे पकवाना न तो करते हैं न कराते हैं वे मुनि पकानेके आरंभसे निवृत्त हुए एक भिक्षामात्रसे संतोषको प्राप्त होते हैं ॥ ८१९ ॥ असणं जदि वा पाणं खजं भोजं च लिज पेजं वा। पडिलेहिऊण सुद्धं भुंजंति पाणिपत्तेसु ॥ ८२०॥ अशनं यदि वा पानं खाद्यं भोज्यं च लेां पेयं वा । प्रतिलेख्य शुद्धं भुंजते पाणिपात्रेषु ॥ ८२० ॥ अर्थ-भात आदि दूध आदि लाडू आदि रोटी आदि खाद्यवस्तु मांड आदि आहारको शुद्ध देख हाथरूपी पात्रमें रखकर जीमते हैं ॥ ८२० ॥ जं होज अविवण्णं पासुग पसत्थं तु एसणासुद्धं । भुजंति पाणिपत्ते लडूण य गोयरग्गम्मि ॥ ८२१ ॥ यत् भवति अविवर्ण प्रासुकं प्रशस्तं तु एषणाशुद्धं । भुंजते पाणिपात्रे लब्ध्वा च गोचराग्रे ॥ ८२१ ॥ अर्थ-जो भोजन कुरूप न हो प्रासुक हो सुंदर हो एषणा समितिसे शुद्ध हो उसको भिक्षाके समय पाकर पाणिपात्रमें खाते हैं ॥ ८२१ ॥ जं होज बेहि तेहिअंच वेवण्ण जंतुसंसिटुं। अप्पासुगं तु णचा तं भिक्खं मुणी विवजेति॥८२२॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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