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________________ अनगारभावनाधिकार ९। २९१ अच्छीतरह जानकर उसके बाद जितना कुछ दोष समूह है सबको त्याग देते हैं ॥ ७९९ ॥ सावजकरणजोग्गं सव्वं तिविहेण तियरणविसुद्धं । वजंति वजभीरू जावज्जीवाय णिग्गंथा ॥ ८००॥ सावधकरणयोग्यं सर्व त्रिविधेन त्रिकरणविशुद्धं । वर्जयंति अवद्यभीरवः यावज्जीवं निग्रंथाः ॥ ८०० ॥ अर्थ-दोषोंसे डरनेवाले मुनिराज मनवचनकायसे शुद्ध कृत कारित अनुमोदनासे समस्त सदोष जो इंद्रिय परिणाम वा क्रिया हैं उनको मरणपर्यंत छोड़ देते हैं । ८०० ॥ तणरुक्खहरिच्छेदणतयपत्तपवालकंदमूलाई । फलपुप्फबीयघादं ण करिति मुणी ण कारिंति॥८०१॥ तृणवृक्षहरिच्छेदनत्वकपत्रप्रवालकंदमूलानि । फलपुष्पबीजघातं न कुर्वति मुनयो न कारयति ॥८०१॥ अर्थ-मुनिराज तृण वृक्ष हरित इनका छेदन वक्कल पत्ता कोंपल कंद मूल इनका छेदन तथा फल पुष्प बीज इनका घात न तो आप करते है और न दूसरेसे कराते हैं ॥ ८०१ ॥ पुढवीय समारंभं जलपवणग्गीतसाणमारंभं । ण करेंति ण कारेंति य कारेंतं णाणुमोदंति ॥ ८०२॥ पृथिव्याः समारंभं जलपवनाग्नित्रसानामारंभं । न कुर्वति न कारयति च कुर्वतं नानुमोदंते ॥ ८०२॥ अर्थ-मुनिराज पृथिवीका खोदना आदि समारंभ तथा जल वायु अनि त्रसजीव इनका सींचना आदि आरंभ न तो करते हैं न कराते हैं और न करनेवालेकी प्रशंसा करते हैं ॥ ८०२ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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