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________________ २८७ अनगारभावनाधिकार ९। एयाइणो अविहला वसंति गिरिकंदरेसु सप्पुरिसा। धीरा अदीणमणसा रममाणा वीरवयणम्मि ॥७८७॥ एकाकिनः अविह्वला वसंति गिरिकंदरेषु सत्पुरुषाः। धीरा अदीनमनसो रममाणा वीरवचने ॥ ७८७ ॥ अर्थ–सहायतारहित उत्साहसहित धीर वीर दीनवृत्तिरहित महावीरखामीके वचनोंमें रमते हुए ऐसे श्रेष्ठ मुनि पहाड़की गुफा. ओंमें रहते हैं ॥ ७८७ ॥ वसधिसु अप्पडिबद्धा ण ते ममत्तिं करेंति वसधीसु। सुण्णागारमसाणे वसंति ते वीरवसदीसु॥ ७८८ ॥ वसतिषु अप्रतिबद्धा न ते ममत्वं कुर्वति वसतिषु । शून्यागारमशानेषु वसंति ते वीरवसतिषु ॥ ७८८ ॥ अर्थ-वसतिकाओं ममतारहित अभिप्रायवाले वे साधु वस. तिकाओंमें ममता नहीं करते और वीरपुरुषोंके रहनेके स्थान ऐसे शून्यस्थान स्मशानभूमि आदि स्थान उनमें रहते हैं ॥ ७८८ ॥ पन्भारकंदरेसु अ कापुरिसभयंकरेसु सप्पुरिसा। वसधी अभिरोचंति य सावदबहुघोरगंभीरा ॥७८९॥ प्राग्भारकंदरेषु च कापुरुषभयंकरेषु सत्पुरुषाः । वसतिमभिरोचंते श्वापदबहुघोरगंभीराः ॥ ७८९ ॥ अर्थ--पर्वतोंके निकुंजोंमें व जलकर विदारे पर्वतोंके दराड़ोंमें जोकि सत्त्वहीन पुरुषोंको भयके उपजानेवाले हैं ऐसे स्थानोंमें सिंह व्याघ्र आदिकर अतिगहन भयानकस्थानोंमें गंभीर स्वभावको धारनेवाले श्रेष्ठ मुनि रहनेकी रुचि करते हैं ॥ ७८९ ॥ एयंतम्मि वसंता वयवरघतरच्छच्छभल्लाणं ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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