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________________ अनगारभावनाधिकार ९ । २८३ अर्थ — अस्थिर नाशसहित इस जीवनको और परमार्थरहित इस मनुष्यजन्मको जानकर स्त्री आदि उपभोग तथा भोजन आदि भोगोंसे अभिलाषारहित हुए, निर्ग्रथादिस्वरूप चारित्र में दृढ बुद्धिवाले, घरके रहनेसे विरक्त चित्तवाले ऐसे वीरपुरुष भोगमें आये फूलोंकी तरह गाय घोड़ा आदि धन सोना इनकर परिपूर्ण ऐसे बांधव जनों को छोड़ देते हैं ।। ७७३।७७४ ॥ जम्मणमरणुव्विग्गा भीदा संसारवासमसुभस्स । रोचंति जिणवरमदं पवयणं वडमाणस्स ॥ ७७५ ॥ जन्ममरणोद्विना भीताः संसारवासे अशुभात् । रोचंते जिनवरमतं प्रवचनं वर्धमानस्य || ७७५ ॥ अर्थ — जन्म और मरणसे कंपित तथा संसार वासमें दुःखसे भयभीत मुनि वृषभादि जिनवर के मतकी वर्धमान स्वामीके द्वादशांग चतुर्दश पूर्वस्वरूप प्रवचनकी श्रद्धा करते हैं । ७७५ ॥ पवरवरधम्मतित्थं जिणवरवसहस्स वडमाणस्स । तिविहेण सद्दहंति य णत्थि इदो उत्तरं अण्णं ।। ७७६ ॥ प्रवरवरधर्मतीर्थं जिनवरवृषभस्य वर्षमानस्य । त्रिविधेन श्रद्दधति च नास्ति इत उत्तरमन्यत् ॥ ७७६ ॥ अर्थ — वृषभदेव व महावीर खांमी इन सब तीर्थकरोंके अति श्रेष्ठ धर्मरूपी तीर्थको मनवचनकायकी शुद्धतासे श्रद्धान करते हैं। क्योंकि इसतीर्थसे अधिक अन्यतीर्थ कोई नहीं है ॥ ७७६ ॥ उच्छाहणिच्छिदमदी ववसिदववसायबद्धकच्छा य । भावाणुरायरता जिणपण्णत्तम्मि धम्मम्मि ॥ ७७७ ॥ उत्साह निश्चितमतयो व्यवसितव्यवसायबद्धकक्षाश्र ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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