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________________ २८२ मूलाचार अणगारभावणमिणं सुसमणपरिकित्तणं सुणह ॥ ७७१ निश्शेषदेशका नि इमानि सूत्राणि धीरजनबहुमतानि उदाराणि अनगारभावनानीमानि सुश्रमणपरिकीर्तनानि शृणुत ॥७७१ अर्थ —ये सूत्र सुआचार सिद्धांत के कहनेवाले हैं, गणधरादिकोंके बहुत मान्य हैं, खर्गादिफलके देनेवाले हैं उत्तममुनियों की कीर्तिके करनेवाले हैं ऐसे इन अनगारभावनासूत्रों को भो साधुजनो ! तुम सुनो ॥ ७७१ ॥ " णिग्गंथमहरिसीणं अणयारचरित्तजुत्तिगुत्ताणं । णिच्छिदमहातवाणं वोच्छामि गुणे गुणधराणं ॥ ७७२ ॥ निर्ग्रथमहर्षीणां अनगारचरित्रयुक्तिगुप्तानाम् । निश्चितमहातपसां वक्ष्यामि गुणान् गुणधराणाम् ॥ ७७२ ॥ अर्थ — अनगारों के चारित्रयोगकर वेष्टित, जिनका तप महान् निश्चल, गुणोंके धारक ऐसे सब परिग्रह रहित महामुनियोंके गुणोंको मैं कहूंगा ॥ ७७२ ॥ अब लिंगशुद्धिको कहते हैं;चलचवलजीविदमिणं णाऊण माणुसत्तणमसारं । णिग्विण्णकामभोगा धम्मम्मि उवद्विदमदीया ॥ ७७३ ॥ णिम्मा लिय सुमिणाविय धणकणयसमिद्धबंध वजणं च । पयति वीरपुरिसा विरत्तकामा गिहावासे ॥ ७७४ ॥ चलचपलजीवितमिदं ज्ञात्वा मनुष्यत्वमसारं । निर्विकामभोगा धर्मे उपस्थितमतयः ।। ७७३ ॥ निर्माल्यसुमनस इव धनकनकसमृद्धबांधवजनं च । प्रजहंति वीरपुरुषाः विरक्तकामा गृहवासे ।। ७७४ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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