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________________ अनगारभावनाधिकार ९। २८१ कांचनप्रियंगुविद्रुमघनकुंदमृणालवर्णान् ॥७६७ ॥ अनगारमहर्षीणां नागेंद्रनरेंद्रेद्रमहितानां । वक्ष्यामि विविधसारं भावनासूत्रं गुणमहत् ॥ ७६८ ॥ अर्थ-तीनलोकमें जयलक्ष्मी और पुण्य इन दोनोंकर सहित तथा सुवर्ण सरसोंका फूल मूंगा रमणीक मेघकुंद पुष्प कमलनाल इनके समान रंगयुक्त शरीरवाले ऐसे जिनेंद्र देवोंको नमस्कारकर नागेंद्र चक्रवर्ती इंद्र इनकर पूजित ऐसे गृहादि परिग्रहरहित महामुनियोंके गुणोंकर महान् सब शास्त्रोंमें सारभूत ऐसे भावनासूत्रको मैं कहता हूं ॥ ७६७-७६८॥ . लिंगं वदं च सुद्धी वसदिविहारं च भिक्ख णाणं च । उज्झणसुद्धी य पुणो वकं च तवं तधा झाणं ॥७६९॥ एदमणयारसुत्तं दसविधपद विणयअत्थसंजुत्तं । जो पढइ भत्तिजुत्तो तस्स पणस्संति पावाइं॥७७०॥ लिंगस्य व्रतस्य च शुद्धिः वसतिर्विहारश्च भिक्षा ज्ञानं च । उज्झनशुद्धिः च पुनः वाक्यं च तपः तथा ध्यान।।७६९।। एतानि अनगारसूत्राणि दशविधपदानि विनयार्थसंयुक्तानि। यः पठति भक्तियुक्तः तस्य प्रणश्यति पापानि ॥ ७७० ॥ अर्थ-लिंगकी शुद्धि, व्रतशुद्धि, वसतिशुद्धि, विहारशुद्धि, भिक्षाशुद्धि, ज्ञानशुद्धि, उज्झनशुद्धि, वाक्यशुद्धि, तपशुद्धि और ध्यानशुद्धि । ये दसपदवाले विनय. अर्थकर सहित अनगारसूत्र हैं; इनको जो भक्ति सहित पढता है उसके पाप नष्ट होजाते हैं ॥ ७६९-७७० ॥ णिस्सेसदेसिदमिणं सुत्तं धीरजणबहुमदमुदारं ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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