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मूलाचारअर्गलके छेदक हैं मोह रहित हैं मिथ्यात्व ज्ञानावरणी दर्शनावरणीकर्मोके विनाशक है ऐसे सिद्ध हमें संसारसे शीघ्र ही तारो॥७६५ जह मज्झ तह्मि काले विमला अणुपेहणा भवेजण्हू । तह सबलोगणाहा विमलगदिगदा पसीदंतु ॥७६६॥
यथा मम तसिन् काले विमला अनुप्रेक्षा भवेयुः। तथा सर्वलोकनाथा विमलगतिगताः प्रसीदंतु ॥ ७६६ ॥
अर्थ-जिसतरह अंतसमयमें मेरे बारह अनुप्रेक्षा निर्मल हों उसतरह निर्मलग तिको प्राप्त हुए सबलोकके खामी सिद्ध भगवान मुझपर प्रसन्न हों ऐसी प्रार्थना मैं करता हूं ॥ ७६६ ॥
इसप्रकार आचार्यश्रीवट्टकेरिविरचित मूलाचारकी हिंदी. भाषाटीकामें बारह अनुप्रेक्षाओंको कहनेवाला
आठवां द्वादशानुप्रेक्षाधिकार
समाप्त हुआ ॥ ८॥
अनगारभावनाधिकार ॥ ९॥
आगे मंगलाचरणपूर्वक अनगारभावनाको कहते हैंवंदित्तु जिणवराणां तिहुयणजयमंगलोववेदाणं । कंचणपियंगुविहुमघपाकुंदमुणालवणयाणं ॥७६७ ॥ अणयारमहरिसीपां, पाइंदपारिंदइंदमाहिदाणंः । वोच्छामि विविहसारं भावणसुत्त्रं गुणमहत्तं॥७६८॥
वंदित्वा जिनवरान त्रिभुवनजयमंगलोपपेतान् ।