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________________ २८० मूलाचारअर्गलके छेदक हैं मोह रहित हैं मिथ्यात्व ज्ञानावरणी दर्शनावरणीकर्मोके विनाशक है ऐसे सिद्ध हमें संसारसे शीघ्र ही तारो॥७६५ जह मज्झ तह्मि काले विमला अणुपेहणा भवेजण्हू । तह सबलोगणाहा विमलगदिगदा पसीदंतु ॥७६६॥ यथा मम तसिन् काले विमला अनुप्रेक्षा भवेयुः। तथा सर्वलोकनाथा विमलगतिगताः प्रसीदंतु ॥ ७६६ ॥ अर्थ-जिसतरह अंतसमयमें मेरे बारह अनुप्रेक्षा निर्मल हों उसतरह निर्मलग तिको प्राप्त हुए सबलोकके खामी सिद्ध भगवान मुझपर प्रसन्न हों ऐसी प्रार्थना मैं करता हूं ॥ ७६६ ॥ इसप्रकार आचार्यश्रीवट्टकेरिविरचित मूलाचारकी हिंदी. भाषाटीकामें बारह अनुप्रेक्षाओंको कहनेवाला आठवां द्वादशानुप्रेक्षाधिकार समाप्त हुआ ॥ ८॥ अनगारभावनाधिकार ॥ ९॥ आगे मंगलाचरणपूर्वक अनगारभावनाको कहते हैंवंदित्तु जिणवराणां तिहुयणजयमंगलोववेदाणं । कंचणपियंगुविहुमघपाकुंदमुणालवणयाणं ॥७६७ ॥ अणयारमहरिसीपां, पाइंदपारिंदइंदमाहिदाणंः । वोच्छामि विविहसारं भावणसुत्त्रं गुणमहत्तं॥७६८॥ वंदित्वा जिनवरान त्रिभुवनजयमंगलोपपेतान् ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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