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________________ द्वादशानुप्रेक्षाधिकार ८ । रुद्धास्रवस्य एवं तपसा युक्तस्य निर्जरा भवति । द्विविधा च सापि भणिता देशतः सर्वतश्चैव ॥ ७४४ ॥ अर्थ - इसप्रकार जिसने आस्रवको रोक लिया है और जी तर सहित है ऐसे मुनिके कर्मोंकी निर्जरा होती है वह निर्जरा एकदेश सर्वदेश ऐसे दो प्रकारकी है || ७४४ ॥ संसारे संसरंतस्स खओवसमगदस्स कम्मस्स । सव्वस्सवि होदि जगे तवसा पुण णिज्जरा विउला७४५ संसारे संसरतः क्षयोपशमगतस्य कर्मणः । २७३ सर्वस्यापि भवति जगति तपसा पुनः निर्जरा विपुला ७४५ अर्थ - इस जगत में चतुर्गतिरूप संसारमें भ्रमण करते सभी जीवोंके क्षयोपशमको प्राप्त कर्मोंकी निर्जरा होती है यह एकदेश निर्जरा है । और जो तपसे निर्जरा होती है वह सकलनिर्जरा है । जह धादू धम्मंतो सुज्झदि सो अग्गिणा दु संतत्तो । तवसा तधा विसुज्झदि जीवो कम्मेंहि कणयं व ७४६ 1 यथा धातुः धम्यमानः शुध्यति सः अग्निना तु संतप्तः । तपसा तथा विशुध्यति जीवः कर्मभ्यः कनकमिव ॥ ७४६ अर्थ — जैसे सुवर्णपाषाण धमाया हुआ अग्निसे तपाया गया कीटादिमलरहित होके शुद्ध होजाता है उसी तरह यह जीव भी तपरूपी असे तपाया गया कर्मोंसे रहित होके शुद्ध होजाता है ॥ ७४६ ॥ णावरमारुदजुदो सीलवरसमाधिसंजमुज्ज लिदो । दह तवो भववीयं तणकट्ठादी जहा अग्गी ॥ ७४७॥ ज्ञानवरमारुतयुतं शीलवरसमाधिसंयमोज्वलितं । १८ मूला •
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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