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मूलाचारआस्रवद्वारनिरोधे नवकर्मरजास्रवो न भवेत् ॥ ७४१॥ - अर्थ-मन वचन कायकर जिसने इन्द्रियोंको रोक लिया है और जो ईर्या आदि समितियोंके पालनमें प्रमादरहित है ऐसे चारित्रयुक्त मुनिके आस्रवद्वारके रुक जानेपर नवीनकर्मीका आस्रव नहीं होता ॥ ७४१॥ मिच्छत्ताविरदीहिं य कसायजोगेहिं जं च आसवदि । दसणविरमणणिग्गहणिरोधणेहिं तु णासवदि ॥७४२
मिथ्यात्वाविरतिभिः च कषाययोगैः यच्च आस्रवति । दर्शनविरमणनिग्रहनिरोधनस्तु न आस्रवति ॥ ७४२ ॥
अर्थ-मिथ्यात्व अविरति कषाय योग इनसे जो कर्म आते हैं वे सम्यग्दर्शन विरति कषायनिग्रह योगनिरोध इनसे यथाक्रमकर नहीं आते ॥ ७४२॥ संवरफलं तु णिव्वाणमिति संवरसमाधिसंजुत्तो। णिचुजुत्तो भावय संवर इणमो विसुद्धप्पा ॥ ७४३ ॥
संवरफलं तु निर्वाणमिति संवरसमाधिसंयुक्तः। नित्योद्युक्तो भावयसंवरमिमं विशुद्धात्मा ॥ ७४३ ॥
अर्थ-संवरका फल मोक्ष है इसकारण संवरके ध्यानकर सहित हुआ, सबकाल यत्नमें लगा ऐसा निर्मल आत्मा होके इस संवरका चिंतवन कर ॥ ७४३ ॥
आगे निर्जरानुप्रेक्षाका वर्णन करते हैं;रुद्धासवस्स एवं तवसा जुत्तस्स णिजरा होदि । दुविहा य सावि भणिया देसादो सव्वदो चेय ७४४