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________________ २७१ द्वादशानुप्रेक्षाधिकार ८॥ आगे संवरभावनाको कहते हैं;तम्हा कम्मासवकारणाणि सव्वाणि ताणि रुभिंजो। इंदियकसायसण्णागारवरागादिआदीनि ॥ ७३८॥ तसात् कर्मास्रवकारणानि सर्वाणि तानि रोधयेत् । इन्द्रियकषायसंज्ञागौरवरागादिकादीनि ॥ ७३८ ॥ . अर्थ-इसलिये जो कर्मास्रवके कारण इन्द्रिय कषाय संज्ञा गौरव रागादिक हैं उन सबको रोके ॥ ७३८ ॥ रुद्धेसु कसायेसु अ मूलादो होंति आसवा रुद्धा । दुभत्तम्हि णिरुद्ध वणम्मि णावा जह ण एदि ॥७३९ रुद्धेषु कषायेषु च मूलात् भवंति आस्रवा रुद्धाः। दुर्वहति निरुद्धे वने नौः यथा न एति ॥ ७३९ ॥ अर्थ-कषायोंके रोकनेसे मूलसे लेकर सभी आस्रव रुक जाते हैं । जैसे छिद्रको रोकनेसे नाव पानीमें नहीं डूबसकती ॥ इंदियकसायदोसा णिग्घिप्पंति तवणाणविणएहिं । रजूहि णिधिप्पंति हु उप्पहगामी जहा तुरया ॥७४० इन्द्रियकषायदोषा निगृह्यते तपोज्ञानविनयैः । रज्जुभिः निगृह्यते खलु उत्पथगामिनो यथा तुरगाः ७४० अर्थ-इन्द्रिय कषाय और द्वेष ये तप ज्ञान और विनयसे रोके जाते हैं, जैसे कुमार्गमें जाते हुए घोड़े लगामसे रोक दिये जाते हैं ॥ ७४० ॥ मणवयणकायगुतिंदियस्स समिदीसु अप्पमत्तस्स । आसवदारणिरोहे णवकम्मरयासवो ण हवे ॥७४१॥ मनोवचनकायगुप्तेंद्रियस्य समितिषु अप्रमत्तस्य ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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