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________________ २७४ मूलाचारदहति तपो भवबीजं तृणकाष्ठादि यथा अग्निः॥ ७४७॥ अर्थ-ज्ञानरूपी प्रचंडपवनकर सहित, शील उत्तमसमाधि संयम इनकर प्रज्वलित जो तप वह संसारके कारण कर्मोको भस्म करदेता है । जैसे अमि, तृण काठ आदिको भस्म करडालती है ॥ ७४७ ॥ चिरकालमजिदंपि य विहुणदि तवसारयत्तिणाऊण । दुविहे तवम्मि णिचं भावेदव्वो हवदि अप्पा ॥७४८॥ चिरकालमर्जितमपि च विधुनोति तपसा रज इति ज्ञात्वा । द्विविधे तपसि नित्यं भावयितव्यो भवति आत्मा ॥७४८॥ अर्थ-बहुतकालका संचय किया हुआ भी कर्म तपसे नष्ट होजाता है ऐसा जानकर दोप्रकारके तपमें आत्मा निरंतर भावने योग्य है ॥ ७४८॥ णिजरियसव्वकम्मो जादिजरामरणबंधणविमुक्को। पावदि सुक्खमणंतं णिजरणं तं मणसि कुजा॥७४९॥ निजीर्णसर्वकर्मा जातिजरामरणबंधनविमुक्तः। . प्राप्नोति सुखमनंतं निर्जरणं तन्मनसि कुर्यात् ॥ ७४९ ॥ अर्थ-उसके वाद सब कर्मोंकर रहित, जन्म जरा मरणरूपी बंधनोंकर रहित हुआ अतुलसुखको पाता है इसलिये मनमें निर्जरा भावना चिंतवन करना चाहिये ॥ ७४९ ॥ आगे धर्मानुप्रेक्षाका स्वरूप कहते हैंसव्वजगस्स हिदकरो धम्मो तित्थंकरहिं अक्खादो। घण्णा तं पडिवण्णा विसुद्धमणसा जगे मणुया॥७५० सर्वजगतो हितकरो धर्मः तीर्थकरैः आख्यातः ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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