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द्वादशानुप्रेक्षाधिकार ८ । २६५ उस संसारको अनंत जानकर अनंतसुखका स्थान ऐसे मोक्षस्थानका यत्नसे ध्यानकर ॥ ७१९ ॥ ___ आगे अशुचिभावनाको कहते हैं;णिरिएम असुहमेयंतमेव तिरियेसु बंधरोहादी। मणुयेसु रोगसोगादियं तु दिवि माणसं असुहं॥७२०
नरकेषु अशुभमेकांतमेव तिर्यक्षु बंधरोधादयः । मनुजेषु रोगशोकादयस्तु दिवि मानसं अशुभं ॥ ७२० ॥
अर्थ-नरकमें सदाकाल दुःख ही हैं, घोड़ा हाथी आदि तिर्यंचगतिमें बंधन ताडन आहारादिका रोकना ये दुःख हैं, मनुप्यगतिमें रोग शोक आदिका दुःख है, देवगतिमें दूसरेकी आज्ञामें रहना आदि मानसिक दुःख है ॥ ७२० ॥ आयासदुक्खवेरभयसोगकलिरागदोसमोहाणं । असुहाणमावहोवि य अत्थो मूलं अणत्थाणे ॥ ७२१
आयासदुःखवैरभयशोककलिरागद्वेषमोहानाम् ।। अशुभानामावहोपि च अर्थो मूलमनर्थानाम् ॥ ७२१ ॥
अर्थ-धनके पैदा करनेमें दुःख, वैर, भय शोक कलह राग द्वेष, मिथ्यात्व असंयमरूप मोह-इन अशुभोंकी प्राप्ति होना ये संसारमें महान् दुःख है । अथवा जितने अनर्थ (अशुभ ) हैं उनका मूलकारण धन है ॥ ७२१ ॥ दुग्गमदुल्लहलाभा भयपउरा अप्पकालिया लहुया। कामा दुक्खविवागा असुहा सेविजमाणावि ॥७२२॥
दुर्गमदुर्लभलाभा भयप्रचुरा अल्पकालिका लघुकाः । कामा दुःखविपाका अशुभाः सेव्यमाना अपि ॥ ७२२ ॥