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________________ २६६ मूलाचार अर्थ-इस संसारमें कष्टसे मिलनेवाले अपनेको इष्ट पदार्थ मिलने कठिन हैं, मारण बंधन आदि भयसहित हैं, थोड़े काल रहनेवाले हैं साररहित हैं । और सेवन कियेगये कामभोग भी दुःखके ही देनेवाले हैं इसलिये अशुभ हैं ॥ ७२२ ॥ असुइचिअविले गन्भे वसमाणो वत्थिपडलपच्छण्णो। मादूइसेभलालाइयं तु तिव्वासुहं पिबदि ॥ ७२३ ॥ अशुच्याविले गर्भे वसन् वस्तिपटलप्रच्छन्नः। मातृश्लेष्मलालापितं तु तीव्राशुभं पिबति ॥ ७२३॥ अर्थ-यह जीव मूत्रमलयुक्त गर्भमें वसता जरायु (जेर) कर लिपटा हुआ माताके भक्षणसे उत्पन्न श्लेष्मा लारकर सहित तीव्र दुर्गध रसको पीता है ॥ ७२३ ॥ मंसहिसेभवसरुहिरचम्मपित्तंतमुत्तकुणिपकुडि । बहुदुक्खरोगभायण सरीरमसुभं वियाणाहि ॥ ७२४ मांसास्थिश्लेष्मवसारुधिरचर्मपित्तांत्रमूत्रकुणिपकुटीं । बहुदुःखरोगभाजनं शरीरमशुभं विजानीहि ॥ ७२४ ॥ अर्थ-मांस हाड कफ मेद लोही चाम पित्त आंत मूत्र मल इनका घर, बहुत दुःख और रोगोंका पात्र ऐसे शरीरको तुम अशुचि जानो ॥ ७२४ ॥ अत्थं कामसरीरादिगंपि सव्वमसुभत्ति णाऊण । णिविजंतो झायसु जह जहसि कलेवरं असुई।७२५ अर्थ कामशरीरादिकमपि सर्वमशुभमिति ज्ञात्वा । निर्वेद्यमानः ध्याय यथा जहासि कलेवरं अशुचि ॥७२५॥ 1. अर्थ-स्त्री वस्त्र धनादि मैथुन शरीरादि ये सभी अशुभ हैं
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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