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________________ २५८ मूलाचारवजदि मचुवसगदो ण जणं कोई समं एदि ॥६९८ ॥ खजनस्य परिजनस्य च मध्ये एकः रुजातः दुःखितः । व्रजति मृत्युवशगतः न जनः कश्चिदपि समं एति॥६९८॥ अर्थ-भाई भतीजा आदि खजन, दासीदास आदि परिजन इनके मध्यमें अकेला ही रोगी दुःखी हुआ मृत्युके वशमें पड़ा परलोकको गमन करता है। इसके साथ कोई भी मनुष्य नहीं जाता ॥ ६९८ ॥ एक्को करेइ कम्म एको हिंडदि य दीहसंसारे। एक्को जायदि मरदि य एवं चिंतेहि एयत्तं ॥ ६९९ ॥ एकः करोति कर्म एकः हिंडति च दीर्घसंसारे । एक: जायते म्रियते च एवं चिंतय एकत्वं ॥ ६९९ ॥ . अर्थ-यह जीव अकेला ही शुभअशुभ कर्म करता है, अकेला ही दीर्घसंसारमें भटकता है, अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मरता है । इसतरह एकत्वभावनाका तुम चिंतवन करो ॥ ६९९ ॥ ___ आगे अन्यत्वभावनाका खरूप कहते हैं:मादुपिदुसयणसंबंधिणो य सव्वेवि अत्तणो अण्णे । इहलोगबंधवा ते ण य परलोगं समा णेति ॥७००॥ मातृपितृस्वजनसंबंधिनश्च सर्वेपि आत्मनः अन्ये । इहलोकबांधवास्ते न च परलोकं समं गच्छति ॥ ७०० ॥ अर्थ-माता पिता कुटुंबीजन और संबंधी ये सभी अपने आत्मासे न्यारे हैं वे इसलोकके लिये ही भाई (सहायक ) हैं बरंतु परलोकमें साथ नहीं जासकते ॥ ७०० ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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